Sunday, 30 July 2017

हमारे भारत में भ्रष्ट नेताओं, अभिनेताओं और जजों को सजा नहीं होती- सूरज कुमार बौद्ध

अन्याय पर टिकी हुई न्याय व्यवस्था

पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायपालिका द्वारा तीन बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री (वजीर-ए-आजम) रहे नवाज शरीफ को अयोग्य करार दिया जाना पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अदालती निष्पक्षता की दृष्टि से एक मिसाल है। अमूमन पाकिस्तान की लोक वितरण प्रणाली तथा सरकारी संस्थाएं अंतर्राष्ट्रीय पारदर्शिता की मानक में बहुत पीछे होते हैं। पिछले शुक्रवार को पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की खंडपीठ ने बंद कोर्ट रूम से अपना फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के जज एजाज अफजल अपने आदेश में कहते हैं कि "मियां नवाज शरीफ अपने घोषित आय का झूठा विवरण दिए हैं। नवाज शरीफ संसद के एक ईमानदार सदस्य बने रहने के लायक नहीं है। इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने से अयोग्य करार दिया जाता है।"

सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले का पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया ने किया स्वागत

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस ऐतिहासिक फैसले को सुनाए जाने पर पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में क्रिया प्रतिक्रिया का दौर चल पड़ता है। पूर्व क्रिकेटर तथा वर्तमान में विपक्ष विपक्षी नेता इमरान खान कहते हैं कि "अदालत के इस फैसले से पाकिस्तान की जीत हुई है। आमतौर पर मुल्क में दो तरह के कायदे हैं, एक कमजोर व गरीब के लिए और दूसरा ताकतवर व अमीर के लिए। लेकिन अदालत के इस फैसले ने इस परिपाटी को तोड़ दिया है।" पाकिस्तान की अवाम उत्साह से लबरेज है। स्वयं नवाज शरीफ के समर्थक भी इस ऐतिहासिक फैसले से आश्चर्यचकित हैं। नवाज शरीफ अपने पद से इस्तीफा दे दिए हैं लेकिन वह अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को अभी भी नकार रहे हैं। फिलहाल नवाज शरीफ कुछ भी कहें लेकिन पाकिस्तान के सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से उनका राजनीतिक भविष्य समाप्त हो चुका है।

क्या है पनामा पेपर्स लीक मामला?
ज्ञातव्य है कि पनामा पेपर्स पनामा की कंपनी मोसेक फोनसेका द्वारा इकट्ठा किया हुआ 1 करोड़ 15 लाख गुप्त फाइलों का भंडार है। इनमें कुल 2,14,000 कंपनियों से सम्बन्धित जानकारियां है। इसमें उस कंपनी के निर्देशक आदि की जानकारी भी है। पिछले साल मई 2016 में पनामा पेपर्स लीक की खबर पूरी दुनिया में तहलका मचा देती है। अमेरिका स्थित खोजी पत्रकारों की अन्तराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल कॉन्सोर्टियम ऑफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) के नेतृत्व में दुनिया के 78 देशों के 107 मीडिया संस्थानों के 350 से ज्यादा पत्रकारों ने पनामा पेपर्स मामले से जुड़े दस्तावेजों का एक साल तक अध्ययन किया। उसके बाद यह खुलासा हुआ। आईसीआईजे को किसी अज्ञात सूत्र ने इन दस्‍तावेजों को उपलब्‍ध कराया था।

भारत सहित दुनिया की अनेक हस्तियां कटघरे में...
पनामा पेपर्स खुलासे में करीब 450 भारतीय फ़िल्मी हस्तियों, उद्योगपतियों तथा नेताओं का भी नाम सामने आया है जिन्होंने टैक्स चोरी और काला धन सफेद करने के लिए टैक्स हैवन माने जाने वाले देशों में धन का निवेश किया। इनमें से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह, अमिताभ बच्चन और उनकी बहू ऐश्वर्या राय बच्चन, अजय देवगन, डीएलफ के मालिक केपी सिंह, गौतम अडानी के भाई विनोद अडानी जैसे बहुतों नाम शामिल हैं। विदेशों में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के करीबियों, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ (दोषी करार), मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक, सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद, पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत बेनजीर भुट्टो, लीबिया के पूर्व शासक कर्नल गद्दाफी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के परिवार समेत कई हस्तियों के नाम हैं।

भारत में पनामा पेपर्स के आरोपी बनें सरकारी ब्रांड एंबेसडर

भारत दुनिया का एक अजूबा देश है। यहां पर चोर लुटेरे और बेईमान नेताओं को सजा नहीं होती है। कानून की पेचीदगियों में गुल्ली डंडा खेलते हुए भारत की न्याय व्यवस्था जातिवाद के समंदर में गोते लगाते हुए नजर आती है।  जिस पनामा पेपर्स लीक मामले में पाकिस्तानी अदालत ने पाकिस्तानी वजीरे आजम तक को नहीं बख्शा उसी पनामा पेपर्स खुलासे में शामिल भारतीय हस्तियाँ मौजमस्ती की जिंदगी जी रहे हैं। हद तो तब हो जाती है जब पनामा पेपर्स खुलासे में नामित टैक्स चोर आरोपी को सरकारी योजनाओं का ब्रांड अंबेसडर बनाया जाता है। अगर पनामा पेपर्स लीक में मायावती या लालू प्रसाद यादव का नाम होता तो यह बिकाऊ मीडिया सुबह शाम नैतिकता की राग अलापती रहती। लेकिन अडानी, अमिताभ, रमन सिंह, अजय देवगन जैसों पर खामोश है।

पाकिस्तानी अदालत का फैसला भारतीय न्यायपालिका के लिए एक सीख।
मैं पाकिस्तानी अदालत के निष्पक्षता को सलाम करता हूं। भारत में अदालतों में पंडित पुरोहित लोग बैठे हैं। भारत के जज "मोर सेक्स नहीं करते" का पाठ पढ़ाते हैं। यहां पर बलात्कारी सरेआम घूमते हैं लेकिन आंदोलनकारियों को तुरंत जेल में डाल दिया जाता है। यहां स्वघोषित ऊंची जाति की लड़की तथा  नीचे जाति के लड़के प्यार किए जाने पर  उनकी हत्या कर दी जाती है। प्रेमी जोड़ों को सरेआम नंगा घुमाया जाता है पर कुछ नहीं होता है। यहां भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए जज को जातीय मानसिकता से ग्रस्त जजों द्वारा अदालत की अवमानना का दोषी करार देकर जेल में डाल दिया जाता है लेकिन ओपी मिश्रा जैसे रिश्वतखोर सवर्ण जजों को कोई सजा नहीं होती है। रोहित वेमुला के हत्यारे खुलेआम घूम रहे हैं, सहारनपुर के असली दंगाई खुलेआम घूम रहे हैं। अखलाख और पहलु खान के हत्यारों का कानून कुछ नहीं कर पा रही है। ऊना उत्पीड़न कांड के पीड़ित आज भी इन्साफ को तरस रहे हैं। हाल में ही एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें भीड़ प्रेमी जोड़े को नंगा करके ढ़ोल नगाड़े बजाते हुए सड़क पर घुमा रही है। मीडिया ऐसे खबरें दिखाने की जरूरत नहीं समझती है। हम नेताओं को क्या कहें भारत में न्यायाधीश भी जांच प्रक्रिया से भागते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायपालिका यह मानकर बैठी है कि सवर्ण न्यायाधीश कभी अपराधी नहीं हो सकते हैं। खैर श्रृंखला बहुत लंबी है। सच्चाई पर किसी देश का एकाधिकार नहीं होता है। पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रधानमंत्री को अयोग्य करार देना सच में एक ऐतिहासिक फैसला है। हमारे भारत में भ्रष्ट नेताओं, अभिनेताओं और जजों को सजा नहीं होती है। काश भारत की न्यायपालिका पाकिस्तान से कुछ सीख पाती !
द्वारा- सूरज कुमार बौद्ध
(लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)


Thursday, 27 July 2017

हिंदू मुस्लिम कर-करके दंगा कराने वालों, यहां पर खूब शांति है, बहरे नहीं हैं हम

सत्ता की सफारी पर सवार होकर जब कोई  तानाशाह शासक सच पर पाबंदी लगाता है तो उसके विरोध में जज्बाती चेहरों का सामने आ जाना तय हो जाता है क्योंकि जब भी किसी को हद से ज्यादा डराया जाता है तो उसके दिल में डर खत्म हो जाता है।

ऐसे ही एक क्रांतिकारी चेहरे का नाम रोहित वेमुला था जिसकी संस्थानिक हत्या कर दी गई। चूंकि रोहित वेमुला को आत्महत्या तक ले जाने में मजबूर करने में आंध्र प्रदेश के विधायक, हैदराबाद विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर तथा केंद्रीय मंत्री तक का नाम आया था इसलिए रोहित वेमुला द्वारा आत्महत्या किए जाने की निष्पक्ष जांच ना होकर जांच इस बात पर सिमटती हुई नजर आई की रोहित वेमुला दलित था या नहीं। हुकूमत द्वारा आम अवाम पर आए दिन ढाए जा रहे ज़ुल्म और ज़्यादती के खिलाफ बने आंदोलन के प्रतीक रोहित वेमुला को समर्पित करते हुए पढ़िए सामाजिक क्रांतिकारी चिंतक सूरज कुमार बौद्ध की रचना "अभी मरे नहीं हैं हम"....


      "अभी मरे नहीं हैं हम"
उनसे कह दो कि अभी डरे नहीं है हम,
हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम।

बहुत जुनून है मुझमें इस नाइंसाफी के खिलाफ,
सर फिरा है मगर सरफिरे नहीं हैं हम...

बड़ी ऊंची पहाड़ है, है फ़तह बहुत मुश्किल, अभी से हार क्यों माने अगर चढ़े नहीं हैं हम।

तेरे भड़काने से फिरकापरस्त हो जाएं?
तुम्हारी तरह ज़मीर से गिरे नहीं हैं हम।

हिंदू मुस्लिम कर-करके दंगा कराने वालों,
यहां पर खूब शांति है, बहरे नहीं हैं हम।

तेरी सियासत ही मुल्क का माहौल बिगाड़ रहा,
पर हमारी जंग जारी है अभी ठहरे नहीं है हम।

दो कौड़ी के दाम से मेरा जमीर मत खरीदो,
अमानत में खयानत कर बिके नहीं हैं हम।

जम्हूरियत में तानाशाही की चोट ठीक नहीं,
कल भी इंकलाबी थे, अभी सुधरे नहीं हैं हम।

एक रोहित के मौत से हमे खामोश मत समझो,
अब हजार रोहित निखरेंगे बिखरे नहीं हैं हम।

उनसे कह दो कि अभी डरे नहीं है हम,
हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम।

द्वारा- सूरज कुमार बौद्ध
(रचनाकार भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)


Monday, 24 July 2017

बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर का अपमान मत करो: इं0 डी0 प्रकाश गौतम

जैसा कि सभी जानते हैं कि बाबा साहेब डॉo भीमराव आंबेडकर विश्वरत्न है। बाबा साहेब डॉ० आंबेडकर पूरी दुनिया में अपने त्याग, समर्पण, मानवतावादी दृष्टिकोण, शोषितों के मसीहा, शिक्षा, संगठन और संघर्ष की बदौलत जाने जाते हैं। सर्वविदित है कि बाबा साहेब डॉ0 भीमराव आंबेडकर से बड़ा विद्धवान अभी तक भारत में कोई पैदा नही हुआ है। देश के गरीब, शोषित, वंचित तथा उपेक्षित समाज के प्रति उनके त्याग को कभी भुलाया नहीं जा सकता। संपूर्ण देश तथा समाज के प्रति उनके जैसा कोई बलिदानी और त्यागी भी भारत में अभी तक पैदा नही हो सका है। बाबा साहेब ने जीवन पर्यंत मनुवादियों का अपमान सहन किया और गरीबी भी सहन की, किन्तु उन्होंने अपना आत्मसम्मान कभी किसी के हाथो बिकने नही दिया। उनके जैसा आत्मसम्मान पाने वाला व्यक्ति भारत में आज तक पैदा नही हो सका है। कौन नही जानता कि बाबा साहेब के उपकारों की बदौलत आज:


1-देश के करोड़ों लोगों को छुआछूत से छुटकारा मिल गया
2-देश के करोड़ों लोगों की गरीबी दूर हो गई।
3-देश की करोड़ों महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिल गया।
4-देश के करोड़ों लोग अधिकारी-कर्मचारी, डॉक्टर, इंजीनियर्स, वकील, जज  आदि बन गए।
5-देश के लाखों गरीब लोग व्यापारी बन गये।
6-देश के लाखों लोग विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, रक्षा मंत्री और गृह मंत्री तक बन गए।
7-देश के लाखो लोग ग्राम पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, जिला पंचायत अध्यक्ष, पार्षद, प्रधान, प्रमुख और मेयर बन गए। 
8-अनुसूचित जाति -जनजाति और पिछड़े समाज के अनेकों लोग राज्यपाल, राजदूत, न्यायाधीश और मुख्य न्यायाधीश तक बन गए। 
9-अनुसूचित जाति , जनजाति और पिछड़े समाज से देश के सर्वोच्च नागरिक अर्थात राष्ट्र्पति तक बन गए।  
10-लाखों लोग अरबपति और करोड़ों लोग करोड़पति बन गए।

उपरोक्त के अलावा देश में :-
1- बाबा साहब डॉ० अंबेडकर द्वारा इंटर्न कमीशन के समक्ष प्रस्तुत किए गए विचारों के आधार पर रिजर्व बैंक की स्थापना हुई।
2-भाखड़ा नांगल बाँध एवं दामोदर घाटी जैसी अनेकों सिंचाई परियोजनाओं का संचालन हुआ।
3-बिजली उत्पादन और थर्मल पावर की समस्याओं का विश्लेषण करने, बिजली प्रणाली के विकास तथा पनबिजली सर्वेक्षण के लिए "केंद्रीय तकनीकी विद्युत बोर्ड" (CTPB) के माध्यम से ग्रिड सिस्टम को स्थापित कराया गया।
4-देश की सभी महिला कार्मिको को प्रसूति अवकाश का अधिकार तथा महिला और बाल श्रम संरक्षण अधिनियम (महिलाओं के श्रम बिल के लिए) पारित कराया गया।
5-मजदूरो को 14-16 घंटे के स्थान पर 8 घंटे काम लेने की व्यवस्था तथा श्रमिकों एवं कर्मचारियों के कल्याण के लिए महंगाई भत्ता (डीए) और श्रम कल्याण कोष की स्थापना कराई गई।
6-भारतीय सांख्यिकी कानून: 1942 में भारतीय सांख्यिकी अधिनियम पारित कराया गया।
7-कर्मचारियों को काम करने के दौरान शारीरिक रूप से विकलांगता, चिकित्सा देखभाल, चिकित्सा अवकाश से सम्बंधित क्षतिपूर्ति के लिए कर्मचारी राज्य बीमा(ईएसआई) की स्थापना कराई गई।
8- मार्च 1944 में केन्द्रीय जल सिंचाई और नेविगेशन आयोग (CWINC) की स्थापना की।
9- द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत पुनर्निर्माण समिति की स्थापना करके बाबा साहेब डॉ० आंबेडकर द्वारा देश में कृषि, उद्योग तथा आर्थिक सुधार पर जोर दिया गया।
10- बाबा साहेब डॉ० अंबेडकर ने संसद में हिंदू कोड बिल पेश करके महिलाओं के सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी ! जो आगे चलकर हिन्दू कानून का रूप धारण किया ! जिससे महिलाओं को बराबरी का हक़ मिला।
11- बाबा साहब डॉ० भीमराव अंबेडकर के अथक प्रयासों की बदौलत ही भारत में राष्ट्रीय रोजगार एजेंसी की स्थापना हो पाई।
12- अंततः सबसे बड़ा योगदान यह कि भारतीय संविधान की रचना करके बाबा साहब डॉ० भीमराव अंबेडकर ने देश के सभी नागरिकों में समता, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को स्थापित किया।

उपरोक्त के आलावा देशहित में अनेकों काम बाबा साहेब डॉ0 भीमराव अंबेडकर द्वारा किये गए है।
क्या ऐसा और इतना महान कार्य देश के किसी भी व्यक्ति द्वारा किया गया?
इसका सिर्फ एक ही उत्तर है-नहीं।
किसी खास नेता या व्यक्ति ने किसी सामान्य व्यक्ति के लिए कुछ खास भला अवश्य किया हुआ संभव हो सकता है, जिस कारण वह व्यक्ति भला करने वाले उस खास व्यक्ति या नेता का अनुयाई या भक्त या अंधभक्त हो सकता है। वह व्यक्ति उस भला करने वाले के कार्यो का गुणगान भी कर सकता है, उसके चरित्र का भी गुणगान कर सकता है, उसमे हमें कोई आपत्ति नही है।
कोई खास व्यक्ति या नेता बाबा साहेब डॉ० आंबेडकर के बाद अनेको सामाजिक कार्य या देश हित में किये गये कार्य करने वाला भी हो सकता है, उसके अनुयाई, या भक्त या अंधभक्त उसका भी गुणगान कर सकते हैं, उसके चरित्र का भी गुणगान कर सकते हैं, उसमे भी हमे कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु बाबा साहेब डॉ0 भीमराव अंबेडकर द्वारा किये गए उपरोक्त महान कार्यों के के बराबर देश के किसी भी व्यक्ति द्वारा आज तक कार्य नहीं किये गए है। इसी के मद्देनजर बाबा साहेब की तुलना किसी भी व्यक्ति से करना बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर का घोर अपमान है। बाबा साहेब के अनुयाइयो व किसी भी खास व्यक्ति या महिला या नेता के अनुयायियों या भक्तों या अंधभक्तो से मेरा हाथ जोड़कर अनुरोध है कि वे बिना सोचें समझे जल्दबाजी या भावुकता में बाबा साहेब की तुलना भारत के किसी भी व्यक्ति या महिला से कदापि न करें।
कृपया बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर द्वारा किये गए त्याग और बलिदान तथा उनके द्वारा किये गए महानतम कार्यों का पूर्णतः सम्मान करे।
हमें गर्व है कि हम दुनिया के उस महानतम युगपुरुष, मनुवादियों से लड़कर देश के सभी गरीबो और महिलाओ को अधिकार दिलाने वाले महानतम योद्धा, पूरी दुनिया में ज्ञान के प्रतीक, भारतीय संविधान के निर्माता, विश्व रत्न, बोधिसत्व, बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर के अनुयायी हैं और वे ही हमारे मार्गदर्शक और प्रेरणाश्रोत हैं।



द्वारा- इं० डी० प्रकाश गौतम 
(लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)



Thursday, 20 July 2017

निर्वाचन कार्ड एवं ईवीएम को आधार कार्ड से लिंक करने की जरूरत

राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। श्री रामनाथ कोविंद जी भारत के अगले राष्ट्रपति होंगे। मैं कुछ आगे लिखूं इससे पहले श्री रामनाथ कोविंद को भारत के राष्ट्रपति चुने  जाने पर मेरा हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं।
राष्ट्रपति चुनाव एवं बैलेट पेपर का इस्तेमाल
राष्ट्रपति चुनाव में जनप्रतिनिधियों द्वारा बैलेट पेपर का इस्तेमाल किए जाने पर सोशल मीडिया में एक बार फिर से ईवीएम मशीन के खिलाफ बहस उठ खड़ा हुआ है। इन दिनों ईवीएम मशीन के खिलाफ धीरे धीरे पुनः नए आंदोलन की शुरुआत हो रही है। ईवीएम मशीन के खिलाफ उठ रहे सवालों के पीछे वाजिब तर्क भी है। दुनिया के बहुत सारे विकसित देश ईवीएम मशीन का इस्तेमाल नहीं करते हैं क्योंकि इसे हैक किया जा सकता है। ईवीएम मशीन के खिलाफ बहुत सारे समाज सुधारकों तथा सामाजिक चिंतकों ने भी आवाज उठाई हैं। विपक्षी दल के अनेक राजनेताओं ने भी चुनाव प्रक्रिया के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे ईवीएम मशीन पर अपनी नाराजगी व्यक्त की थी तथा मायावती द्वारा पिछले विधानसभा चुनाव में किए गए ईवीएम घोटाले संबंधी आरोप का समर्थन किया था। यह लोकतंत्र के लिहाज से बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनेता लोग जनता को विधायक और सांसद चुनने के लिए अपारदर्शिता का प्रतीक ईवीएम मशीन का इस्तेमाल करने पर मजबूर करते हैं और खुद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को चुनते वक्त बैलेट पेपर का इस्तेमाल करते हैं। यकीनन यह एक सोची समझी साजिश है।
ईवीएम मशीन के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत
गौरतलब है कि मार्च महीने में आए पांच विधानसभा चुनावों ( उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा) के परिणाम ने पूरे देश को आश्चर्यचकित कर दिया। भाजपा को उत्तर प्रदेश में 325 सीट तथा उत्तराखंड में 57 सीट और कांग्रेस मणिपुर में 28 सीट, गोवा 17 सीट तथा पंजाब में 77 सीट जीतकर बहुमत दर्ज करती है। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी समाजवादी पार्टी 54 सीट और जीत की प्रमुख दावेदार बहुजन समाज पार्टी 19 सीटों पर अपने जीत दर्ज कर सिमट गई। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी चुनाव के नतीजे को पूर्व निर्धारित तथा ईवीएम की जीत बताईं। इसके साथ भाजपा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला चैलेंज देते हुए कहती हैं कि अगर उनमें थोड़ी सी पारदर्शिता और हिम्मत है तो बैलेट पेपर से पुनः चुनाव कराएं। निर्वाचन आयोग मायावती के आरोप को बिना किसी जांच पड़ताल के तुरंत नकारते हुए कहता है कि ईवीएम मशीन में कोई धांधली नहीं हुई है। मायावती द्वारा ईवीएम मशीन में धांधली किए जाने सम्बन्धी बयान के बाद पूरे देश में ईवीएम मशीन के खिलाफ चलाए जा रहे आंदोलन में तेजी आ जाती है। जहां-जहां वीवीपीएटी मशीन का इस्तेमाल किया गया था  वहां अधिकांश जगह भाजपा बुरी तरह से हारी हुई थी। आज भी भारत की बहुसंख्य आबादी चुनाव नतीजे को ईवीएम की जीत मानती है।
निर्वाचन कार्ड एवं ईवीएम को आधार कार्ड से लिंक करने की जरूरत
सरकार द्वारा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजना के तहत पब्लिक सब्सिडी और अन्य लाभकारी योजनाओं को आधार कार्ड से जोड़ने का फैसला लिया गया है। LPG स्कीम, मनरेगा की मजदूरी, छात्रवृत्ति कन्या मदद योजना आदि सभी को आधार कार्ड से जोड़ते हुए आधार संख्या को बैंक अकाउंट से लिंक करने को अनिवार्य कर दिया गया है। बिजली बिल, पानी बिल, राशन कार्ड, पैन कार्ड आदि सभी आवश्यक दस्तावेजों को आधार संख्या से लिंक किया जा रहा है। नवंबर 2014 से सूचना तथा प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सिम कार्ड को भी आधार संख्या से लिंक संबंधित नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। मई 2015 में विदेश मंत्रालय यह सूचना जारी की थी कि सभी नागरिकों द्वारा पासपोर्ट को आधार संख्या से लिंक कराना जरूरी है। वर्तमान में आधार संख्या को प्रोविडेंट फंड से भी जोड़ना अनिवार्य कर दिया गया है। अब असली सवाल यह है कि आखिर चुनाव प्रक्रिया में धांधली को रोकने के लिए निर्वाचन कार्ड तथा ईवीएम मशीन को मतदाताओं के आधार संख्या से लिंक करने के लिए सरकार कोई कदम क्यों नहीं उठा रही है? आए दिन फर्जी वोट एवं फर्जी वोटर पकड़े जाते रहते हैं। कई कई जगह तो मरे हुए व्यक्ति के नाम से भी लंबे समय से वोट दिए जाते रहते हैं। आधार कार्ड का ईवीएम से जुड़ जाने पर वोटों की वैधता अंगूठे की छाप के मिलान के बाद ही होगा। इस तरह से फर्जी वोट तथा चुनाव में धांधली का झमेला ही खत्म हो जाएगा। इस संदर्भ में 3 मार्च 2015 को निर्वाचन आयोग ने नेशनल इलेक्टोरल रोल प्यूरिफिकेशन ऑथेंटिकेशन प्रोग्राम (NERPAP) के तहत रजिस्टर्ड मतदाताओं के फोटो को आधार संख्या से लिंक करने पर जोर दिया था। लेकिन उसके बाद सरकार तथा निर्वाचन आयोग दोनों ने इस महत्वपूर्ण कदम को आगे बढ़ाना उचित नहीं समझा। अब केंद्र सरकार तथा निर्वाचन आयोग की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराकर संवैधानिक मूल्यों में जनता का विश्वास बहाल करने के लिए इस महत्वपूर्ण तथा पारदर्शी विकल्प पर विचार करके सकारात्मक निर्णय ले ताकि जनता का विश्वास स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव में बना रहे वरना चुनाव महज एक खेल बनकर रह जाएगा।

द्वारा-सूरज कुमार बौद्ध,
(लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)


Friday, 14 July 2017

अंबेडकर या गोलवलकर दो विचारधारा है, तुम किसे चुनोगे

अगर मानव अधिकारों के उल्लंघन को एक आधार मानकर देखा जाए तो भारत की पहचान एक जातीय हिंसा और उत्पीड़नकारी देश के रुप में की जाती है।

यहां प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक, पंचायत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक हर जगह जातिवाद समाहित है। यह जातिवाद का दंश ही है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के अनेकों एकलव्यों की मौत यहां के ब्राह्मणवादी द्रोणाचार्यों के जातिवादी रवैए की वजह से हुई है। ऐसे में द्रोणाचार्यों के जातिवादी मानसिकता को नकार कर आगे की लड़ाई लड़ने की जरूरत है।

बहुजन समाज के योद्धाओं ! अगर अब नहीं लड़े तो आने वाली नस्लें धिक्कारेंगी हम पर, अपने आप को अकेला मत समझो हम तुम्हारे साथ हैं। मानसिकता उत्पीड़न और लांछन को झेल रहे साथियों के हताश चेतना को अपने क्रांतिकारी शब्दों से क्रांति की रुख का आह्वान करती हुई सामाजिक क्रांतिकारी चिंतक सूरज कुमार बौद्ध की कविता: हम बढ़ते चलेंगे।

        हम बढ़ते चलेंगे...
तुम कदम तो बढ़ाओ हम बढ़ते चलेंगे।
गिरते ही सही संभालते ही सही
लड़ते ही सही लड़खड़ाते ही सही
लेकिन कभी भी रुकेंगे नहीं,
मिशन का कारवां हमारे हाथ है
लिहाजा कभी भी झुकेंगे नहीं।
लाख मुश्किल गर आए हम लड़ते चलेंगे,
तुम कदम तो बढ़ाओ हम बढ़ते चलेंगे...

चलो माना कि बहुत मुश्किल डगर है,
हम क्रांतिकारियों को किसका डर है?
वोट तक सिमट गयी हम मज़लूमों की जिंदगी,
और कब तक करोगे उनके सामने बन्दगी?
अगर पोगा पंडितों का खून है उनमें,
मत भूलना उधम सिंह का जुनून है मुझमें।
अंबेडकर या गोलवलकर दो विचारधारा है,
तुम किसे चुनोगे फैसला तुम्हारा है।
अब समानता की बात सबको मान लेना चाहिए,
'भीम युग' के आहट को पहचान लेना चाहिए।
सब को शिक्षित, संगठित कर हम संघर्ष करेंगे।
तुम कदम तो बढ़ाओ हम चढ़ते चलेंगे।।
द्वारा- सूरज कुमार बौद्ध,
( रचनाकार भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)


Wednesday, 12 July 2017

BJP को रगड़-रगड़ कर तबियत से जो धोया उसी पीड़ा का मोदी जी हमसे बदला ले रहे है

आज लालूप्रसाद यादव के पुत्र और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने बीजेपी और पीएम मोदी पर फसेबूक पेज पर निशाना साधा और लिखा कि "मुझे उस झूठे मुक़दमे में फँसाया जा रहा है जब मेरी उम्र 14 साल थी।उस वक़्त मेरी दाढ़ी-मूँछ भी नहीं आयी थी। 14साल का बच्चा घोटाला कर सकता है क्या? कार्यभार संभालने के पहले दिन ही मैंने स्पष्ट कर दिया था भ्रष्टाचार पर मेरी जीरो टॉलरेंस नीति है।मै किसी प्रकार का भ्रष्टाचार सहन नही करूँगा


शुरू से मैंने ईमानदारी,निष्ठा,लग्न और समर्पण की भावना से काम से किया है। क्या पिछड़े वर्ग से आने के कारण ही मुझे मोदी सजा दिलवा रहे है? पहले BJP लालू प्रसाद जी से डरती थी।अब मुझसे डरती है।हम चुप नहीं बैठेंगे,जनता के बीच उतकर इनके भ्रमजाल और अहंकार को तोड़कर करारा जवाब देंगे। आप हमारे डेढ़-दो साल के कार्यकाल को देखें, कोई उंगली नहीं उठा सकता है कि हमने कोई गलत काम किया हो।मेरे अधीन विभाग परफ़ोरमेंस में नं-1 है।

हाँ, दो साल पहले एक ग़लती की। हमने बिहार चुनाव में BJP को रगड़-रगड़ कर तबियत से जो धोया उसी पीड़ा का मोदी जी हमसे बदला ले रहे है।"

Sunday, 9 July 2017

मैं अन्य पिछड़े वर्ग से हूँ मैं यह ऐलान करता हूँ कि...

मैं अन्य पिछड़े वर्ग से हूँ मैं ये ऐलान करता हूँ कि आगामी चुनावों में मेरा वोट उस दल के लिए होगा जो:--

1. OBC वर्ग को सभी क्षेत्रों में भागीदारी सुनिश्चत करने के लिए जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने का संकल्प रखेगा और फौरी तौर पर 52% आरक्षण देने का प्रावधान करायेगा।

2. मंडल आयोग की सिफारिशों को 100% लागू करने का संकल्प करेगा। जिसके अंतर्गत OBC वर्ग के छात्रों के लिए आवासीय तकनीकि कॉलेज, पिछड़ा वर्ग मंत्रालय, वित्त निगम, गरीब मजदूरों के लिए कृषि भूमि उपलब्ध कराने जैसी अनुसंशायें हैं।

           जय ओबीसी जय संविधान।

सहमत हैं तो आगामी चुनाव तक फारवर्ड करते रहिये, नतीजा अवश्य मिलेगा।

ओबीसी हैं,और सहमत न हों; तो बात करें 9301527229

लोकेश साहू, जिला संयोजक
ओबीसी महासभा जिला-सिवनी (म.प्र)

Friday, 7 July 2017

"भीम संदेश यात्रा" प्रकाश अम्बेडकर और मीरा ताई अम्बेडकर के नेतृत्व में निकाली जायेगी,

20 जुलाई 2017 को खरगोन जिले के महेश्वर से " भीम- संदेश यात्रा" निकाली जायेगी, जिसका प्रारंभ बाबासाहेब अम्बेडकर जी के नाती माननीय - प्रकाश अम्बेडकर जी और मीरा ताई करेगी।

यात्रा महेश्वर से शुरु होकर धामनोद , मानपुर से होती हुई महुँ ( बाबासाहेब की जन्म- स्थली ) पर शाम को सभा के बाद खत्म होगी, सभा को माननीय प्रकाश अम्बेडकर जी द्वारा सम्बोधित किया जायेगा।

इस कार्यक्रम की बैठक कसरावद में समाजिक कार्यकर्ताओं के साथियो के साथ की गई सभी साथियो ने अपना समर्थन देकर कार्यक्रम को सफलतापूर्वक ऐतिहासिक बनाने का संकल्प लिया बैठक में अरविन्द वर्मा, एम. डी. चौबे, नरेन्द्र राठोड़ ( पार्षद ), बबलू कानूडे, देव हतकाले, राहुल वासुरे ( एनी ), यश भार्गव ( बन्टी ) कसरावद नगर के जय भीम युवा संगठन के सभी साथी उपस्थित थे आौर वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी के जिला अध्यक्ष राहुल करोड़े भी उपस्थित थे उन्होंने कहा कि हमारी पूरी टीम इस ऐतिहासिक यात्रा को सफल बनाने के लिए सक्रिय रहेगी संगठन के अविनाश गाडवे, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, सुरेश पासवान राष्ट्रीय महासचिव, और प्रदेश अध्यक्ष राकेश महाले भी उपस्थित रहेंगे।

Thursday, 6 July 2017

आदिवासी व्यक्ति के अंतिम संस्कार करने से रोका गया

मध्यप्रदेश, मुरैना जिले की जौरा तहसील में ग्रंथो द्वारा घोषित उच्च जाति के लोगो द्वारा आदिवासी व्यक्ति की बीमारी से मृत्यु हो जाने पर अंतिम संस्कार करने से रोका गया..
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दैनिक समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ की मप्र के मुरैना जिले की जौरा तहसील में जवाहर कालोनी निवासी एक आदिवासी युवक बेताल पुत्र गनेशा की बीमारी से मृत्यु हो गयी, जब मृतक के परिवारजन अंतिम संस्कार हेतु श्मशान पहुचे तो श्याम शर्मा नामक व्यक्ति द्वारा श्मशान की जमीन को स्वयं की जमीन बताकर बेताल पुत्र गनेशा का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया। इस दौरान ब्राह्मण परिवार द्वारा आदिवासी परिवारों को धमकाया गया और कहा की जिस किसी ने भी यहाँ अंतिम संस्कार किया तो वह सभी की जूते से पिटाई करेंगें।
इस घोर जातिवादी घटना को संज्ञान लेते हुए दीपक राजौरिया, ( म.प्र )प्रदेश सचिव वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी ने शिवराजसिंह चौहान, मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन प्रेषित किया जिसमें उन्हेंने लिखा कि ;

मुख्यमंत्री से निवेदन है की आदिवासी वर्ग के हितो की रक्षा की जावे व आदिवासी वर्ग के साथ अन्याय होने पर आरोपी के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जावे।
की गई कार्यवाही से अवगत कराने का कष्ट करे, कार्यवाही ना होने की दशा में हम आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

दिनांक 06-07-2017
ज्ञापन की प्रतिलिपि-
मा0 अनुसूचित जाति आयोग नई दिल्ली
मा0 राज्य अनुसचित जाति आयोग भोपाल                                                        

भवदीय


बलवेन्द्र सिंह राजौरिया उर्फ़ दीपक राजौरिया
प्रदेश सचिव ( म.प्र ) वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी
डबरा जिला ग्वालियर मप्र
9691322813

सोशल मीडिया पर पाबंदी, बहुजन आवाज पर हमला

आज का दौर जनचेतना का दौर है। लोग गुलामी की जंजीरों से बाहर निकलकर आजादी की सांस लेना चाहते हैं। समाज अपने आप को प्रगतिशील समाज बनाने में लगा हुआ है लेकिन शासक वर्ग को यह बात कतई मंजूर नहीं है कि शोषित समाज स्वतंत्र हो सके। यही वजह है कि शासक वर्ग हमेशा से समाज को अपने कब्जे में रखे रहना चाहते हैं। इस लोकतांत्रिक युग में लोग आजादी की मांग कर रहे हैं। सोशल मीडिया के आ जाने से आम अवाम, मजदूर, आधी आबादी, वंचित उपेक्षित बहुजन समाज को एक ताकत मिली है क्योंकि मुख्यधारा की मनुवादी मीडिया पूंजीपतियों के दलाल बन कर अपने आकाओं की दलाली करने में व्यस्त हैं। पहले जनता को अपनी बात कहने के लिए कोई मंच न होने की वजह से किसी मीडिएटर की जरूरत होती थी लेकिन आज कोई भी व्यक्ति Facebook, WhatsApp, YouTube, Blog, Email, Website........ आदि अकाउंट बनाकर अपने विचार पूरी दुनिया के समक्ष रख सकता है। सोशल मीडिया लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बहाल करने में अपनी प्रमुख भूमिका निभा रहा है। आज मुख्यधारा की मीडिया से उपेक्षित बहुजन समाज अपने विचार को पूरी दुनिया के समक्ष बहुत ही बेबाकी ढंग से रख रहा है।

आस्था, ढोंग, पाखंड, भविष्यवाणी की गाथा गाने में लीन न्यूज़ चैनलों को बहुजन समाज की समस्याओं से कोई परवाह नहीं। उच्च दर्जे के AC कमरों में बैठकर एंकर झारखंड, छत्तीसगढ़ के निर्दोष आदिवासियों को नक्सली करार देते हैं लेकिन एक आदिवासी नक्सली क्यों बनता है इसपर कभी चर्चा नहीं होती। बड़े बड़े TV के एंकर फुटपाथ के किनारे भीख मांग रहे भिखारियों के गरीबी पर भाषण देते हैं लेकिन धन और धरती के बंटवारे पर खामोश रहते हैं। राष्ट्रवाद के आड़ में भारत माता, गौ माता, गंगा माता का नाम लेते हुए एससी, एसटी ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के हितों की बात करने वालों को देश विरोधी करार देते हैं। ऐसे में बहुजनों को देश में चल रही इस ब्राह्मणवादी साजिश का पर्दाफाश करने के लिए सोशल मीडिया एक बेहतर मंच नजर आता है। लेकिन कब तक ! धीरे धीरे सोशल मीडिया भी मनुवादियों के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है।

जी हां, मनुवादियों की फेहरिस्त में  Facebook India का भी नाम जुड़ता हुआ नजर आ रहा है। अब बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व कर रही न्यूज़ चैनल नेशनल दस्तक और न्यूज़85.इन Facebook India के मनुवादी अधिकारियों के इस निरंकुश रवैए का शिकार हुई है। सच्चाई को सामने देखकर अपनी हताशा को व्यक्त हुए  Facebook India ने नेशनल दस्तक को फेसबुक पर कोई भी लिंक अपलोड करने से  रोक दिया गया है। नेशनल दस्तक लिखता है कि "मंगलवार 4 जुलाई से Facebook इंडिया की तरफ से नेशनल दस्तक के फेसबुक पेज पर यह दिखाया जा रहा है कि आपको आपके फेसबुक पेज से लिंक शेयर करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। Facebook India के अधिकारियों ने बगैर सूचित किए नेशनल दस्तक को फेसबुक पेज पर लिंक शेयर करने से रोक दिया है।" न्यूज़ लिंक अपलोड किए जाने से रोके गए चैनल न्यूज़85.इन के संपादक अनुराग यादव जी कहते हैं "जो भी सामाजिक न्याय की बात करेगा वह सत्ताखोर मनुवादियों की नज़र में आ जाएगा। अंततः अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए वे आपको रोकने में लगा देंगे।" यहां मनुवादियों की बौखलाहट स्पष्ट नजर आ रही है। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सी मंडल भी इशारा करते हैं कि बहुजनों को निराश होने की जरूरत नहीं है। पुराने समय में भी वे आपकी जीभ काटते थे।

सचमुच उन्हें सवाल से बहुत डर लगता है। अगर आप सवाल करेंगे तो यकीनन मनुस्मृति का पोषण कर रहे ब्राह्मणवादियों के निशाने पर आना तय है। वह आपको बोलने से रोकेंगे, बोलने से नहीं रोक पाए तो लिखने से रोकेंगे, लिखने से नहीं रोक पाए तो रिपोर्ट पर रिपोर्ट करेंगे, अगर रिपोर्ट पर रिपोर्ट करने से कुछ नहीं कर पाते हैं तो ऊपर बैठे हुए अपने अधिकारी आकाओं के पास शिकायत करेंगे और इन आकाओं को तो इसी मौके का इंतजार होता है। वे बिना वजह बताए आपकी फेसबुक अकाउंट को ब्लॉक कर देंगे। आप ज्यादा से ज्यादा अपील दर्ज करेंगे लेकिन उस अपील का असर तभी होगा जब आपके पास बेहतर जनसमर्थन होगा। नहीं तो Learn more, Learn more का ऑप्शन दिखाते रहेंगे बस। खैर कुछ भी हो जाए पर वजह नहीं बताएंगे। फेसबुक ने खुद मेरी अब तक छः अकाउंट को ब्लॉक कर दिया है। मेरा फेसबुक अकाउंट क्यों ब्लॉक किया गया, मुझे आज तक वजह नहीं बताया गया।
www.welovebabasaheb.in
लोकतंत्र में लड़ाई विचारधारा की होती है। सहमति-असहमति तो हमारे जिंदा होने का प्रमाण है लेकिन किसी को बोलने से रोक दिया जाना यह मनुस्मृति से प्रेरित संस्कृति का परिचायक है। खैर अंबेडकरवाद के इस युग में मनुस्मृति और मनुस्मृति का पोषण कर रहे सत्ताखोर हमारी आवाज पर पाबंदी नहीं लगा सकते हैं। वे नेशनल दस्तक, वी लव बाबासाहेब, नेशनल जनमत, न्यूज़85.इन, जनसंघर्ष.इन, भीम दस्तक जैसे अनेक सभी बहुजन मीडिया को नहीं रोक सकते हैं क्योंकि यह न्यूज़ चैनल हमारी आवाज हैं। गौरतलब है कि बहुत ही कम समय में नेशनल दस्तक , वी लव बाबासाहेब (WLBS) और नेशनल जनमत ने अपने आप को मुख्यधारा की मीडिया से अलग करते हुए एक विकल्प के रुप में प्रस्तुत किया है। यह चुनौती केवल नेशनल दस्तक को नहीं है। यह चुनौती बहुजन एकता पर की गई चुनौती है। यह चुनौती संवैधानिक लोकतंत्र पर की गई चुनौती है। बहुजनों, अपनी इस आवाज को थमने मत देना। हम मार्क जुकरबर्ग तक जाएंगे। हम हमारा प्रतिनिधित्व कर रहे किसी भी चैनल की आवाज को रुकने नहीं देंगे क्योंकि मेरा मानना है कि जिस समाज के पास अपनी मीडिया नहीं होती वह समाज बेजुबान होता है।

आलेख: सूरज कुमार बौद्ध
(राष्ट्रीय महासचिव, भारतीय मूलनिवासी संगठन)


Monday, 3 July 2017

'एक देश, एक बाजार, एक कर' सही है तो 'एक देश, एक जाति' कैसे गलत है?


30 जून और 1 जुलाई के बीच मध्य रात्रि से गुड्स एंड सर्विस टैक्स यानि कि वस्तु एवं सेवा कर कानून को पूरे देश में लागू कर दिया गया है। वस्तु एवं सेवा कर को लगाए जाने की कयास करीब 15 वर्षों से की जा रही है लेकिन सत्ता की सफारी पर सवार केंद्र एवं राज्य सरकारें इस संदर्भ में दृढ इच्छा से कोई मजबूत कदम नहीं उठा रहे थे। खैर अब वस्तु एवं सेवा कर कानून पूरे देश में लागू हो चुका है। दृढ़ इच्छा ना होने के साथ-साथ इसके पीछे एक और भी वजह यह थी कि इसके पहले कि सरकारें जीएसटी को इतनी निरंकुशता से आम जनता के बीच लागू नहीं कर रहे थे क्योंकि वह इसकी नाकामियों से भी भली भांति वाकिफ थे इसलिए वे आम जनता के हित, कमजोर- मजदूर वर्ग के दाल रोटी पर हमला एवं छोटे व मध्यम व्यापारियों के व्यापार पर आघात नहीं कर रहे थे। इस चीज को भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व भी भली भांति समझ रही थी और यही वजह है कि भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए यूपीए सरकार के इस फैसले का तीव्र विरोध किया था। आखिर क्या वजह है कि कल तक जीएसटी के खिलाफ राग अलापने वाली भाजपा आज जीएसटी कानून की इतनी हितैषी हो गई है?

बीड़ी पर टैक्स की दर को बढ़ा दिया गया है लेकिन पेट्रोल, डीजल, एविएशन टर्बाइन फ्यूल जैसे पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी दायरे से बाहर रखा गया है। अब जीएसटी लागू हो जाने से रेस्तरां में खाना, मोबाइल बिल का भुगतान, क्रेडिट कार्ड, बीमा कराना, कोचिंग क्लास, 1000 से अधिक कपड़े एवं बैंकिंग सेवाएं आदि सब महंगे हो गए हैं। पहले मोबाइल पर सर्विस टैक्स 14.5% था अब 18% हो गया है। मनुवाद को परोसते हुए शिक्षा में निजीकरण से वैसे ही गरीब परिवारों को शिक्षा से महरूम किया जा रहा है। सरकारी शिक्षा संस्थानों में शिक्षा के गुणवत्ता की दर बहुत ही चिंताजनक है। कोचिंग संस्थानों पर अधिक जीएसटी दर बढ़ाकर अपने भविष्य को संवारने के ललक में जूझ रहे छात्रों के उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है। सर्विस सेक्टर में 18% टैक्स बढ़ने से मध्यम वर्ग के व्यापारियों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा जिसकी अंततः वसूली उपभोक्ताओं के जेब से ही होगी। भारत जैसे देश जहां आम जनों में तकनीकी साक्षरता की दर बहुत ही नकारात्मक और तकनीकी ढांचा बेहद ही अनियमित एवं अकुशल है, ऐसे में तकनीकी कुशलता पर केंद्रित जीएसटी कानून का लागू हो पाना चिंता का विषय है। चार्टेड अकाउंटेंट मासिक रिटर्न फाइल करने के लिए मनमाना फीस वसूल रहे हैं। आम जनता में नोटबंदी की तरह ही सरकार इस चिन्तनहींन फैसले से निराशा का माहौल छाया हुआ है। जनता अभी भी 15 लाख और काले धन का वापस होने, खुलासा होने का इंतजार कर रही है।

पूंजीपतियों को खुश करने के लिए सरकार आए दिन बेतुकी फैसले ले रही है। बिकाऊ मीडिया मोदी चालीसा पढ़ पढ़कर देश की जनता को खुश करने में लगी हुई है ताकि लोग असली मुद्दों पर ना आ सकें। भारत विभिन्नताओं का देश है। जम्मू कश्मीर की माँग कुछ और हो सकती है तो उत्तर प्रदेश की कुछ और। मुद्रा का मूल्य भी व्यक्ति एवं समाज के सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। लेकिन भाजपा और संघ के लोग 'एक राष्ट्र, एक संस्कृति और एक विधान' की बात करते हैं। जीएसटी कानून को 'एक देश, एक बाजार, एक कर' के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। एकात्मकता की बात करना ठीक है लेकिन किसी भी समाज में निरपेक्ष एकात्मकता पूर्णतः असम्भव है। 'एक देश, एक बाजार, एक कर' की पहल तभी संभव है "जब एक जैसा देश, एक जैसा बाजार, एक जैसे लोग हों।" समानता समान लोगों में होती है। आसमान स्थितियों में रहने वाले लोगों को समान कानूनी दायरे में नहीं बांधा जा सकता है। जीएसटी कानून लागू करना गलत नहीं है लेकिन वर्गीकरण के सिद्धांत एवं बेहतर समीक्षात्मक तैयारी को नज़रंदाज़ करना गलत है। सरकार का कहना है कि 'टैक्स में टैक्स' नहीं इसलिए एक टैक्स होना चाहिए। मैं सरकार से पूंछना चाहता हूं कि इस आधार पर वह यह बताए कि 'मानव जाति में जाति' क्यों होनी चाहिए? अगर 'एक देश, एक बाजार, एक टैक्स' सही है तो 'एक देश, एक जाति' कैसे गलत है? कुछ दिन पहले सोशल मीडिया में अच्छी बहस छिड़ी हुई थी कि 'इस देश को कैशलेस इंडिया (Cashless India) बनाने की ज्यादा जरूरत है या फिर कास्टलेस इंडिया(Casteless India) बनाने की।?' मेरा भी यही सवाल है कि आखिर जातिविहीन भारत(Casteless India) बनाने की घोषणा कब होगी? मुझे उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार है।

सूरज कुमार बौद्ध
(लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)


Saturday, 1 July 2017

ऐसा नहीं है कि मोदी भक्त बेवकूफ है.

सोशल मीडिया की चर्चित पोस्ट..

ऐसा नहीं है कि मोदी भक्त बेवकूफ है.
और भक्त अपनी मूर्खता के कारण मोदी की हर गलती का समर्थन करते हैं.
नहीं भक्त बहुत मेहनत से तैयार किये जाते हैं,
भक्त बनाने की एक लम्बी प्रक्रिया होती है!
भक्त बनाने का एक पूरा राजनीति शास्त्र होता है. भक्त बनाने के पीछे राजनीतिक फायदे का पूरा गणित होता है.

हिटलर ने भी भक्त बनाये थे !

जब हिटलर नें एक करोड़ दस लाख लोगों की हत्या की, तब उसके भक्त हिटलर की जयजयकार कर रहे थे.
हिटलर ने अपने भक्तों के दिमाग में बैठा दिया था कि यहूदी हमारी नौकरी खा रहे हैं.
हमारी सारी समस्या की जड़ यहूदी है , यहूदियों को मार डालेंगे तो हम सुखी हो जायेंगे.
इसके बाद हिटलर ने बूढ़ो औरतों बच्चों समेत एक करोड़ से ज़्यादा लोगों को मारा, जिसमें साठ लाख यहूदी और पचास लाख दूसरे लोग भी थे.

आइये अब भारत की बात करते हैं !

भारत में संघ नें आज़ादी के पहले से ही मुसलमानों , इसाइयों और शोषितो-वंचितों के विरुद्ध नफरत फैलाने का अभियान शुरू कर दिया था.
बड़ी जातियां जो भारत में हमेशा से पैसा और सत्तावान थीं, वे संघ की जन्मदाता थीं.
इनका उद्देश्य यह था कि भारत की आज़ादी के बाद भी पैसे और सत्ता पर हमारा ही कब्ज़ा रहना चाहिये.
पिछली चार पीढ़ियों से भक्त तैयार करने का काम अब इस मुकाम पर पहुंच गया कि इन लोगों ने भारत की सत्ता पर कब्ज़ा करने में सफलता पा ली है.
भक्त दो भावनाओं से भरा हुआ रहता है .
मुसलमानों के प्रति नफरत और मुसलमानों से डर.
नफरत और डर की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति का माध्यम होता है मुसलमानों के खिलाफ दंगा
दंगा ही इस डर और नफरत की आक्सीजन है
लंबे समय तक दंगा ना हो तो भक्त के दिमाग से मुसलमानों के प्रति डर और नफरत दोनों खत्म हो जायेगी, इसलिये संघ बीच बीच में दंगा करवाता रहता है,
मोदी जैसा बनावटी करिश्माई नेता इसलिये तैयार किया जाता है.
ताकि लोगों को नेता की भक्ति के नशे में डाल कर , देश की अर्थव्यवस्था और शासन पर कब्ज़ा किया जाय.
और जब देश को लूटा जाय तो नशे में डूबे हुए लोग कोई आपत्ति ना करें.
नफरत और डर में डूबे हुए भक्त मोदी को सिर्फ इसलिये भगवान मानते है क्योंकि मोदी नें दो हज़ार मुसलमानों को मारा और मुसलमानों को यह दिखा दिया कि हिन्दु डरने वाली कौम नहीं है. भक्त मानते हैं कि मुगलों के शासन में अपना आत्म सम्मान खो चुकी हिन्दु अस्मिता मोदी ने वापिस दिला दी.
भक्त यह भी मानते हैं कि अब अगर मोदी किसी भी मुद्दे पर नीचा देखते हैं तो उसका अर्थ होगा कि हमारे शाश्वत दुश्मन मुसलमान जीत जायेंगे मुसलमानों से हार जाने का काल्पनिक भय ही भक्तों को मोदी की हर गलत बात का समर्थन करने के लिये मजबूर करता है.
साम्प्रदायिकता की राजनीति का यही दोष है
इसमें जनता अपना भला बुरा नहीं सोच पाती
साम्प्रदायिकता के नशे में डाल कर जनता का खूब शोषण किया जा सकता है.

इसलिये हम आम जनता को और युवाओं को

साम्प्रदायिकता की राजनीति के चंगुल से निकालने के लिये काम करते हैं

ना हम रुकेंगे ना हम डरेंगे..


हिमांशु कुमार