महज आठ साल की
नन्हीं सी प्यारी बेटी
और तुम बलात्कारियों का झुंड,
बुझाते रहे अपने हवस को।
मगर तुम्हारी हवस न बुझी,
अंततः बेटी लाश बन गई।
उसी मंदिर में जहां
देवी देवता विराजमान हैं।
क्या उन्हें बेटी की आवाज नहीं आई ?
दरिंदों को एक पल भी लाज नहीं आई ?
बेटियों को बचाने की जरूरत है
तुम गुंडों से लम्पटों से,
जिनका 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ'
एक नारा नहीं बल्कि धमकी है,
जिन्हें सिर्फ सत्ता की प्यास है
वही सत्ता जो हजारों वर्षों से
लूट अत्याचार की कहानी है।
कभी शूद्रों पर, अछूतों पर
व्यथाओं पर, महिलाओं पर...।
याद करो बहन फूलन का
अदम्य साहस-स्वाभिमान....
कि चलो क़त्ल कर दें
मनुवादी पितृसत्ता को
बंदूक की गोलियों से।
और स्थापित करें
स्वाभिमान की ललकार
हरपल.... हरदम... बारंबार....
#JusticeForAsifa
- सूरज कुमार बौद्ध,
(रचनाकार भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
SC/SC Act की पूर्ण बहाली की मांग को लेकर सांसदों ने नाम पत्र की पहली कड़ी, शुरुआत रामविलास पासवान जी से।
सेवा में, श्री रामविलास पासवान जी,
मा0 केन्द्रीय मंत्री, खाद्य एवं उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं जनवितरण, भारत सरकार
12, जनपथ, नई दिल्ली - 110 011
विषयः एस0सी0/एस0टी वर्ग के लोगों की सभाओं मेें जानलेवा हमले होना, सरेआम पिटाई और निर्मम हत्यायें होना, बाबा साहेब और अन्य महापुरूषों की मूर्तियोें को तोडा जाना, आरक्षण खत्म किया जाना, बजट कम किया जाना और एस0सी0/एस0टी एक्ट निष्प्रभावी किया जाना आदि मामलों में आपकी भूमिका के सम्बन्ध में।
आदरणीय महोदय,
उपरोक्त विषयक देशहित व जनहित से जुडे महत्वपूर्ण मामलों के सम्बन्ध में भारतीय मूलनिवासी संगठन एवं एस0सी0/एस0टी वर्ग की भवनाओं केे दृष्टिगत मैं एक साधारण सा भारतीय नागरिक आपके समक्ष कुछ विचारणीय बिन्दु रखने का प्रयास कर रहा हूँ। कृपया इन बिन्दुओं से संज्ञानित होने के लिये अपने व्यस्त समय में से कुछ वक्त प्रदान कर देगें, तो मैं आपका बहुत आभारी रहूंगा।
जैसा कि आप जानते ही हैं कि देश की आजादी और संविधान लागू होने से पहले एस0सी0/एस0टी वर्ग के लोग हिन्दुओं की मनुस्मिृति के आधार पर बनाई गई वर्ण व्यवस्था के अन्र्तगत शूद्र वर्ग के भी उपवर्ग अर्थात अछूत वर्ग की निम्न कही जाने वाली उन जातियों का हिस्सा थे, जिनको ना तो पढने का अधिकार था, ना पक्के घर बनाने का अधिकार था, ना सम्पत्ति एकत्र करने का अधिकार था और ना ही गांव के अन्दर रहने का अधिकार था। गांव प्रधान, पार्षद, ब्लाक प्रमुख, विधायक, सांसद या मंत्री बनने का तो सपना भी नहीं देख सकते थे। परन्तु बाबा साहेब डा0 भीमराव आम्बेडकर के लम्बे संघर्ष और पूना पैक्ट के बाद निर्मित भारतीय संविधान में निहित राजनैतिक आरक्षण की व्यवस्था की वजह से आज आप सांसद जैसे गौरवमय पद पर विराजमान हैं। चॅूकि बाबा साहेब ने यह समझा था कि किसी भी समाज की आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं को हल करने की कुंजी राजनैतिक शक्ति है। इसीलिये उन्होने भारत के संविधान में राजनीति के हर स्तर पर आरक्षण की व्यवस्था की थी। जिससे कि इस समाज के सांसद और विधान सभाओं में चुने हुऐ नेता न केवल एस0सी0/एस0टी वर्ग के लिये संविधान में प्राविधानित अधिकारों की रक्षा करेंगे बल्कि समय और परिस्थितियों के बदलाव के साथ-साथ और अधिक अधिकारों को दिलवाना भी सुनिश्चित करेंगे। बाबा साहेब का यह कहना था कि जिस रथ को बडे संघर्ष के बाद मैं यहां तक लेकर आया हूॅ उसे यदि आगे ना बढा सको तो उसे इसी हालात में छोड देना परन्तु किसी भी हालात में उसे पीछे नहीं जाने देना हैं।
श्री सुब्रामन्यम स्वामी जी कहते हैं कि हम आरक्षण को उस हालात में कर देंगे जिसका होना या ना होना बराबर होगा। यह बेहद पीडादायक है कि स्वामी जी के बयान पर किसी भी एस0सी0/एस0टी वर्ग के सांसद की ओर से कोई भी प्रतिक्रिया नही आई। आने वाले वक्त में जब ये संविधान बदल देंगे या बिना बदले ही राजनैतिक आरक्षण समाप्त कर देंगे, तो पुनः अधिकार प्राप्त करना असम्भव सा हो जायेगा और यदि सम्भव भी हुआ तो ना जाने कितनी लम्बी लडाई लडनी पडेगी, ना जाने कितना धन, समय और मेहनत लगेगी? क्योंकि आज तो हमारे पास संसद भी है और विधानसभायें भी हैं जिनमें रहकर विरोध करने या कुछ कहने से अपनी बात मनवाने में सक्षम हैं। यदि राजनैतिक आरक्षण एक बार हमारे हाथों से निकल गया तो अपनी बात रखने के लिये हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा और हम सैंकडों साल पिछड जायेंगे।
आप यह भी जानते हैं कि हमारे देश में दो तरह की राजनैतिक विचारधारायें हैं। एक लोकतान्त्रिक विचारधारा और दूसरी साम्प्रदायिक विचारधारा। साम्प्रदायिक विचारधारा के अन्र्तगत मुख्य रूप से राष्टृीय स्वयंसेवक संघ है, जिसका मुख्य उदद्ेश्य भारत का नाम हिन्दुस्तान रखना, संविधान बदलना, आरक्षण समाप्त करना, मनुस्मृति को लागू करना, हिन्दु राष्टृ घोषित करना और वर्ण व्यवस्था लागू करके अछूत समाज को फिर से अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी के अंधकार में धकेलकर मानसिक रूप से अपना गुलाम बनाकर रखना है। अभी हाल ही में आर0एस0एस0 ने मेरठ में राष्टृोदय नामक कार्यक्रम रखा था। जिसके पोस्टरों में हिन्दू धर्म के जिन पांच वर्णाें का जिक्र किया गया था वो थे-ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अछूत/अस्र्पश्य। जिसमें डा0 आम्बेडकर और संत रविदास को अस्र्पश्य लिखा था। वर्तमान समय में इस वर्ण व्यवस्था का विरोध संसद में आपको करना चाहिए था, परन्तु आपकी चुप्पी के कारण इन पोस्टरों का भारी विरोध एस0सी0/एस0टी वर्ग के युवाओं को करना पडा। परिणामतः आर0एस0एस0 को विवादित पोस्टरों को हटाना पडा। परन्तु फिर भी उन्होने अपनी सोच व विचारधारा का खुलकर प्रचार किया।
भाजपा के मंत्री श्री अनंत हेगडे संविधान को बदलने की बात खुलेआम कह चुके हैं। इस प्रकार संविधान बदलने मात्र से ही एस0सी0/एस0टी वर्ग के समस्त अधिकार छीन लिये जायेंगे। जिसमें इन वर्गाें का राजनैतिक आरक्षण भी शामिल है।
सम्भवतः आपको यह भी ज्ञात होगा कि ये सब प्रक्रियायेें पूरी वे करेंगे कैसे? किसी भी नियम या कानून में बदलाव के लिये लोकसभा और राज्य सभा में बहुतमत का होना जरूरी होता है। आर0एस0एस0 भाजपा को ढाल बनाकर 2019 मंे लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सन् 2022 तक वे राज्यसभा में भी बहुमत में होंगे और फिर संविधान बदलने का इनका सपना पूरा हो जायेगा। फिर ये हमारे देश को हिन्दू राष्टृ घोषित करके मनुस्मृति लागू कर देगें तथा एस0सी0/एस0टी एवं अन्य पिछडे वर्गाें के आर्थिक, सामाजिक, और शैक्षिक अधिकारों को बहुत हद तक सीमित कर देंगे। बडे दुख की बात यह होगी कि इस कार्य में आपकी भागीदारी भी शामिल रहेगी। यानि यह अपने पैरों पर कुल्हाडी मारने जैसा तो होगा ही साथ ही साथ बाबा साहेब के पूरे संघर्ष पर पानी फेरकर एस0सी0/एस0टी और अन्य पिछडे वर्गाें की लगभग 100 करोड आबादी को फिर से गर्त में डालने का काम होगा। ऐसा भी नहीं है कि इसमें आपकी कोई निजी हानि नहीं होगी? आपकी खुद की आने वाली पीढियां भी आपको सदैव कोसेंगी। ऐसे हालात में जबकि एस0सी0/एस0टी और अन्य पिछडे वर्गाें पर चारों तरफ हमले और अत्याचार हो रहे हों तो आपकी चुप्पी हम सबको बहुत हैरान करती है।
यह बिन्दु भी किसी हद तक सही है कि किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता या नेता को पार्टी के दिशा निर्देशों और नीतियों पर चलना पडता है। परन्तु एस0सी0/एस0टी वर्गाें की स्थिति कुछ भिन्न है। क्योंकि इस वर्ग के सांसदों को बाबा साहेब डा0 आम्बेडकर ने आरक्षण का अधिकार इस वर्ग के सम्मान और सम्पत्ति की सुरक्षा के लिये दिया था। इसलिये इस वर्ग के सांसदों और विधायकों की पहली प्रार्थमिकता पार्टी के दिशा निदेर्शों पर चलने की नहीं बल्कि इन वर्गाें के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करना होनी चाहिये। जब भी इन वर्गाें पर अत्याचार होता है या उनके अधिकारों को छीना जाता है तो पूरे देश के लोग आपकी ओर बडी उम्मीदों से देखते हैं। परन्तु आपकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आने से यह समाज बेहद निराश हो जाता हैं।
आज पूरे देश में लोकतन्त्र और भारतीय संविधान की धज्जियां उडाकर एस0सी0/एस0टी वर्ग के लोगों की सभाओं एवं कार्यक्रमों मेें जानलेवा हमले किये जा रहे हैं, जातीय आतंकवाद के तहत नौजवानों की सरेआम पिटाई की जा रही है और खुलेआम हत्यायें की जा रही हैं तथा जेलों में ठूंसा जा रहा है, महिलाओं को खुलेआम जिंदा जलाया जा रहा है। बाबा साहेब व अन्य मूलनिवासी महापुरूषों की मूर्तियां तोडकर अपमानित किया जा रहा हैं, प्रमोशन में आरक्षण बिल्कुल समाप्त कर दिया गया है और योजनाबद्ध तरीके से सरकारी संस्थाओं का निजीकरण करके आरक्षण खत्म किया जा रहा है। इस वर्ग का प्रत्येक क्षेत्र में बजट कम किया जा रहा है, और अब तो हद ही हो गई कि एक मात्र एस0सी0/एस0टी एक्ट (कानून) जो इस वर्ग के सम्मान का सुरक्षा कवच था, सुप्रीम कोर्ट के एक जज द्वारा दिये गये आदेश के माध्यम से वह भी छीन लिया गया है।
उपरोक्त दुखद परिस्थितियों के लिये अगर मुख्य रुप से कोई जिम्मेदार है, तो वे हैं लोकसभा और राज्यसभा में विराजमान एस0सी0/एस0टी वर्ग के सांसद। कृपया आप ईमानदारी और गम्भीरता से विचार करें और सोचें कि आप स्वयं क्या रहे हैं? यदि आपकों लगता है कि आप चुप रहकर समाज के प्रति अपना कर्तव्य निभा रहें तो कुछ भी ना करें और यदि आपका आत्मावलोकन कहता है कि आप अपना दायित्व नहीं निभा रहे हैं तो शीघ्र ही निर्णय लीजिये और साम्प्रदायिक विचारधारा को साहस के साथ छोडकर एस0सी0/एस0टी और अन्य पिछडे वर्गाें की तरक्की के रास्ते प्रशस्त करने निश्चय करें।
अतः देशहित, जनहित एवं 100 करोड की आबादी वाले एस0सी0/एस0टी और अन्य पिछडे वर्गों के हित में आपसे विनम्र अनुरोध है कि बचा लीजियेे बाबा साहेब डा0 भीमराव आम्बेडकर जी द्वारा निर्मित भारतीय संविधान और इन वर्गाें के अधिकारांे को। यदि इस महान कार्य के लिये आपको सांसद की कुर्सी भी छोडने के लिये मजबूर होना पडे तो दे दीजिये यह बलिदान। इस बलिदान के लिये सदियों-सदियों तक आपको याद रखा जायेगा। यदि इस मुहिम में एस0सी0/एस0टी वर्ग के सभी सांसदों द्वारा एस0सी0/एस0टी एक्ट को निष्प्रभावी करने के आदेश पारित करने वाले जज के खिलाफ संसद में महाभियोग लाया जाता है तो यह प्रशंसनीय कार्य होगा। यदि सरकार की हीलाहवाली के कारण उक्त महाभियोग पारित भी नहीं हो पाता है तो इस वर्ग के समस्त सांसदो द्वारा त्यागपत्र देने का निर्णय लिया जाना चाहिये। हमें पूरा विश्वास है कि आपकी सांसद की कुर्सी भी नहीं जायेगी और एस0सी0/एस0टी एवं अन्य पिछडे वर्गाें के अधिकारों की वापसी भी हो सकेगी।
अत्यन्त सम्मान सहित,
जय भीम, जय पेरियार, जय भारत, जय मूलनिवासी
दिनांकः 25 मार्च 2018
भवदीय
- सूरज कुमार बौद्ध, राष्ट्रीय महासचिव, भारतीय मूलनिवासी संगठन (BMS) मो0न0- +917985393258
महाड़ सत्याग्रह' सामाजिक सशक्तिकरण हेतु क्रांतिकारी पहल: सूरज कुमार बौद्ध
भारत मे जबसे आर्यों ने अपना शासन स्थापित किया तबसे शूद्रों पर अत्याचार जारी रखा। हिन्दू आर्यों ने शूद्रों पर अत्याचार की सारी हदें पार कर दिया था। अगर हम आधुनिक काल की भी बात करें तो भी शूद्रों को तालाब में पानी पीने की इजाजत नहीं थी। जबकि अगस्त 1923 को बॉम्बे लेजिस्लेटिव कौंसिल के द्वारा एक प्रस्ताव लाया गया, कि वो सभी जगह जिनका निर्माण और देखरेख सरकार करती है, ऐसी जगहों का इस्तमाल हर कोई कर सकता है। इस प्रस्ताव को जनवरी 1924 में उस अधिनियम को नगर निगम परिषद के द्वारा लागु किया गया। 1924 में यह बिल पास तो हो चुका था कि किसी भी सार्वजनिक तालाब में देश के सभी नागरिकों को पानी पीने का अधिकार है लेकिन हिंदुओं ने शूद्रों को पानी पीने की इजाजत नहीं दी। लोग भूख प्यास से तड़प तड़प मरते रहे लेकिन निर्दयी ठेकेदारों का पत्थर दिल नहीं पिघला। बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर से यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उनकी आंखों के सामने शुद्र समाज का अपमान किया जा रहा था। अब बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर इसके खिलाफ एक बड़ी आंदोलन का आगाज करते हैं और वह आंदोलन था महाड़ सत्याग्रह, दिन 20 मार्च 1927.
महाड़ सत्याग्रह और हमारा हक
भीमराव आम्बेडकर ने सभी शुद्र व अछूत समाज के अपील किया कि सभी लोग 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड़ स्थान पर एकत्रित हों। भीमराव आंबेडकर लोगों की नजर में इतने बड़े उम्मीद थे कि उनकी एक आवाज पर पूरा समाज उमड़ पड़ता था। उनका आह्वान सुनते ही 20 मार्च 1927 को महाड़ हजारों लोगों की भीड़ से भर गया। महाड़ के सार्वजनिक तालाब चावदार तालाब से पानी पीकर यह सिद्ध करना था कि अब अछूत समाज छुआछूत की इस महल का विध्वंस करने का ठान लिया है।
इस सत्याग्रह में हजारों की संख्या में अछूत शामिल हुए। जैसे ही बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेेडकर लोगों के साथ पानी पीने को आगे बढ़े तो पूरा वातावरण लोगों द्वारा डॉ भीमराव आम्बेडकर की जय जयकारों से गूंज उठा। सभी लोग महाड़ के चवदार तालाब पहूँचे और बाबा साहेब आम्बेडकर ने अपने दोनों हाथों से उस तालाब पानी पिया, फिर उनका अनुकरण करते हुए हजारों सत्याग्रहियों ने भी तालाब से पानी पिया। अब सभी हिंदू जाति समूहों एवं अन्य धर्म के लोग मुस्लिम, ईसाई तक भी उस ताबाल का पानी पी सकते थे क्योंकि महाड़ सत्याग्रह अब यह सुनिश्चित कर दिया था कि सार्वजनिक तालाब पर सबका समान हक होता है। और इस तरह वर्णवादी असमानता के विरोध में बाबा साहेब ने सार्वजनिक व प्रभावकारी क्रान्ति की पहली सुरूवात की। महाड़ सत्याग्रह की महत्ता बाबा साहेब के इसी कथन से लगाई जा सकती है कि 'महाड़ सत्याग्रह केवल पानी के लिए नहीं था बल्कि मानवाधिकार को स्थापित करने के लिए है।' (Mahad Satyagraha not for Water but to Establish Human Rights.”) Dr Babasaheb Ambedkar Writings and Speeches, Volume 17, Part 1).
क्या शुद्र व अछूत हिन्दू हैं?
हिंदुओं द्वारा अछूतों को तालाब का पानी पाने के अधिकार नकारा गया था, जबकि सवर्ण हिंदू शूद्रों को हिंदू धर्म का हिस्सा मानते थे। लेकिन बात कुछ और थी। दरअसल हिंदुओं ने अछूतों को कभी हिन्दू धर्म का हिस्सा माना ही नहीं। चूंकि उन्हें गुलामों की, नौकरों की, मजदूरों की....... की जरूरत थी और सबसे बड़ी बात की कभी यहां का मूलनिवासी शुद्र समाज विद्रोह न कर दे, अतः उन्हें धर्म की चाशनी में डुबोए रखना जरूरी था... इसलिए हिंदुओं ने शूद्रों को भी हिन्दू करार दिया ताकि उनकी सत्ता, सर्वोच्चता और सिंहासन बना रहे। 20 मार्च 1927 के इस महाड़ सत्याग्रह ने क्रांतिकारी परिवर्तन को जन्म दिया।
सामाजिक सशक्तिकरण का नया रूप
बाबा साहेब ने आज के दिन तीन प्रमुख क्रांतिकारी सलाह दी थी जो कि इस प्रकार है, पहला- गंदे व्यवसाय या पेशे को छोड़कर बाहर आना। दूसरा- मरे हुए जानवरों का मांस खाना छोड़ देना और तीसरा– अछूत होने की अपनी स्वयं की हीनभावना से बाहर निकलना और खुद को सम्मान देना। यह कोई आम सूत्र नहीं थे बल्कि वंचितों में लिए भविष्य देखने का अपना नजरिया था। सभी समतापसन्द देशवासियों को "सामाजिक सशक्तिकरण दिवस" (Social Empowernment Day) पर बहुत बहुत बधाई सहित बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर को शत शत नमन। आज के ही दिन 20 मार्च 1927 में बाबा साहेब ने महाड़ सत्याग्रह की शुरुआत कर जातिवादी ब्राह्मणों की नींद उड़ाई थी। आज का दिन हमारे अधिकारों को सुनिश्चित करने का दिन है।
- सूरज कुमार बौद्ध (लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
हमारे मौजूदा हालात और ऐशो-आराम की जिंदगी बुद्ध, कबीर, फूले, रैदास, अंबेडकर जैसे बहुजन महापुरुषों द्वारा समतावादी व्यवस्था की स्थापना हेतु सदियों से किए जा रहे संघर्षों का परिणाम है।
भारत में वर्णवाद के आधार फैली हुई मनुवादी विचारधारा की समाप्ति कर मानवीय संवेदनाओ से परिपूर्ण समतावादी समाज निर्माण की बुनियाद तथागत बुद्ध द्वारा रखी गई थी। जिसे समय-समय पर विभिन्न महापुरुषों द्वारा संभाला गया । हमारे स्वाभिमान सम्मान में मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए अनेकों बहुजन महापुरुषों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया। तब कहीं जाकर आज हम इस भारत से आजादी से सांस ले रहे हैं । बाबा साहब अपने भाषणों में अक्सर कहा करते थे कि जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती वह कौम कभी इतिहास नहीं बना सकती। इस कथन के पीछे बाबा साहेब की यह सोच थी कि सदियों से शोषित , पीड़ित यह बहुजन समाज अपने पुरखों के सामर्थ हुआ बहादुरी के गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेकर निर्भय होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें । क्योंकि जिन वर्गों ने सदियों तक तुम्हारे पूर्वजों को गुलाम बनाए रखा वह कभी नहीं चाहेंगे कि तुम उनकी बराबरी करो। उनसे अपने अधिकारों की मांग करो। ऐसे में वह तुम्हें डराएंगे धमकाएँगे और फिर से अपना गुलाम बनाएंगे। मौजूदा समय में इस मनसा को पूर्ण करने के लिए आज भी जातिवादी मानसिकता से ग्रसित लोग धर्म या मजहब के नाम पर जातीय हिंसा को अंजाम दे रहे है।पिछले एक दशक में सूचना क्रांति के बढ़ते प्रभाव ने शोषित, पीड़ित ,वंचित, बहुजन समाज को मानसिक रुप से काफी शक्तिशाली कर दिया है। परिणाम स्वरुप यह वर्ग आज अपने आपको सामाजिक व राजनीतिक रुप से स्थापित करने में लगा हुआ है । किंतु आज भारत में मौजूद वर्ण व्यवस्था के समर्थकों को आज भी बहुजन वर्ग की तरक्की बर्दाश्त नही है और वह इनके प्रकार से इस वर्ग को दबाने का प्रयास करते हैं । किंतु फिर भी बात नहीं बनती तो हिंसक रूप अख्तियार कर भीमा-कोरेगांव ,सहारनपुर , कानपुर और इलाहाबाद जैसी क्रूरतम घटनाओं को अंजाम देते हैं । बाबा साहब ने हमारे वर्ग की तरक्की के लिए तीन प्रमुख मूल मंत्र दिए हैं -
(शिक्षित रहो, संगठित रहो, संघर्ष करो) क्योंकि सैकड़ों वर्षो से दीनहीन बहुजन समाज आजाद भारत में तब तक अपने आप को स्थापित नहीं कर सकेगा जब तक वह मानसिक व आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हो जाता । इसलिए उन्होंने कहा शिक्षित बनो और संविधान लागू होने से आज तक बहुजन समाज में शिक्षा के क्षेत्र में काफी तरक्की कि जिस समाज में कुछ वर्षों तक गिने चुने लोग शिक्षा ग्रहण कर पाते थे। उसी समाज में आज लाखो डॉक्टर, इंजीनियर, बैरिस्टर और कलेक्टर हो रहे हैं । शिक्षा की बदौलत उपजे ज्ञान ने इस समाज को अपने अधिकारों के प्रति सजग किया। और अपने अधिकारों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया । बाबा साहेब की इस पहली बात में रोटी ,कपड़े के लिए तरसने वाले इस वर्ग को आज आर्थिक व मानसिक रुप से सफल बना दिया है। फिर यह वर्ग
बाबा साहेब की दूसरी बात- संगठित रहो का अनुसरण करने लगा। क्योंकि मानसिक रुप से सफल व आर्थिक रूप से सक्षम संगठन काफी मजबूत होता है । बाबासाहेब ने संगठन के माध्यम से अपने वर्ग के दबे, कुचले लोगों को विकास और उत्थान के लिए प्रयत्न करने की बात कही थी। बाबासाहेब कि इस सोच को सार्थक करने की मंशा से बने संगठनों ने समाज के शैक्षणिक, आर्थिक व सामाजिक विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया। परिणाम स्वरूप गुलामी की बेड़ियों से जकड़ा यह बहुजन समाज आज देश में राज करने का दम भर रहा है ।
बहुजनों का यह मिशन अधिकार प्राप्ति तक तो ठीक था किंतु शासन प्रशासन में भागीदारी की मांग ने वर्णवादी वा संविधान विरोधी तबके को इस वर्ग का जानी दुश्मन बना दिया है। अभी तक जो लड़ाई भेदभाव व असंवैधानिक क्रियाओं को अंजाम देकर लड़ी जा रही थी वह लड़ाई अब सड़कों पर आ गई है क्योंकि गुपचुप तरीके से किए जा रहे शोषण का विरोध बहुजन समाज खुलकर करने लगा है। इसलिए हम यह लड़ाई आमने-सामने की हो गई है। विरोधी वर्ग कत्लेआम कर इस वर्ग को दबाना चाह रहा है वही बहुजन वर्ग इसका डटकर मुकाबला कर रहा है । मौत का यह खेल विगत कुछ वर्षों से निरंतर जारी है ऐसे में
अब बहुजन वर्ग को बाबासाहेब के तीसरे मूल मंत्र संघर्ष करो को अंगीकृत करना होगा। क्योंकि बाबा साहब को पता था कि शिक्षित और संगठित वर्ग की संपन्नता विरोधी वर्ग को कभी हजम नहीं होगी और ऐसा हो भी रहा है प्रमोशन में आरक्षण समाप्त करके विरोधी वर्ग समाज के शिक्षित वर्ग को टारगेट कर रहा है। आरक्षण समाप्ति वां संविधान संशोधन की बात कर समाज के निचले, तबके को कमजोर बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं और राजनीतिक प्रलोभनों के द्वारा समाज के संगठनों में बिखराव पैदा कर रहे हैं।
इन सब का मुकाबला करने के लिए अब हमें भी मतभेद भुलाकर बाबा साहेब द्वारा कही तीसरी बात संघर्ष करो पर अमल करना होगा क्योंकि संघर्ष आज का दौर शुरू हो चुका है और हमारा संघर्ष तभी सफल होगा जब हम संगठित होकर संघर्ष करेंगे।
उदय कुमार गौतम
जिला महासचिव महासचिव फैज़ाबाद
भारतीय मूलनिवासी संगठन
बामसेफ-भारत मुक्ती मोर्चा-राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग संघ का प्रबोधन कार्यक्रम सौसर जिला छिंदवाड़ा (म. प्र) मे संपन्न हुआ।
दिनांक 11 मार्च 2018 रविवार को छिंदवाड़ा ज़िले के सौसर तहसिल मे बामसेफ-भारत मुक्ती मोर्चा - राष्ट्रीय पीछड़ा वर्ग संघ के स्थानिक इकाई द्वारा प्रबोधन कार्यक्रम का आयोजन हुआ।
कार्यक्रम का उद्घाटन व्यापारी संघ के अध्यक्ष दिलीप बागडे ने किया उन्होंने कहा कि समाज में जागरूकता के लिए यह एक अहम कदम है।
कार्यक्रम को अतिथि के रुप मे पी. के. एस. गुर्वे पत्रकार दैनिक भास्कर, श्रीमती करुणा रामकृष्णा वाकोडे, सदस्य जिला पंचायत, सुश्री सुन्दर धुर्वे, नागपूर से bvm के प्रतीक चौहान भी उपस्तित रहेl
कार्यक्रम की अध्यक्षता शकुन प्रधान ने की अपने भाषण मे मंडल आयोग, एस सी -एस टी- ओ बी सी, प्रतिनिधित्व और लोकतंत्र/ ब्राह्मण तन्त्र तथा ईवीएम के बारे मे विस्तार से विश्लेषण किया l
स्थानीय बुद्धिजीवी नागरिकों ने उक्त प्रबोधन कार्यक्रम को खूब पसंद कियाl
देश में अच्छे दिन, 15 लाख, 2 करोड़ रोजगार...... इत्यादि बेहद उम्मीदों से भरे हुए नारों के दम पर भारतीय जनता पार्टी केंद्रीय हुकूमत पर काबिज होती है और इस तरह जनता पिछले 10 साल के निष्क्रिय सरकार को संसद से बेदखल कर देती है। भारत देश की करीब 65 फीसदी आबादी युवा है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हमेसा युवाओं के उम्मीदों को खरे उतरने की वकालत करते रहते हैं लेकिन 05 मार्च 2019 को जारी UGC का सर्कुलर भाजपा की नीयत का पोल खोलने वाला है..
UGC का आरक्षण विरोधी फरमान
एनडीए सरकार द्वारा UGC को आगे करके 05 मार्च 2018 को UGC द्वारा देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों, राज्य विश्वविद्यालयों तथा अनुदान पा रहे अन्य सभी विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रार के नाम एक फरमान जारी किया। इस फरमान के तहत देश के सभी विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में शिक्षकों की भर्ती पूर्ण संख्या के अनुसार न होकर अब विभागवार रोस्टर प्रणाली के जरिए होगी। अब जरा गणित समझिए-
(A)अगर किसी विभाग में 4 सीट निकलती है तो 1 सीट ओबीसी कोटे में जाएगा।
(B) अगर 10 सीट की वैकेंसी निकलती है तो 1 ओबीसी और 1 सीट एससी को मिलेगा।
(C) अगर 14 सीट निकलती है तो 1 सीट ओबीसी, 1 सीट एससी और 1 सीट एसटी के खाते में जाएगा।
मतलब यह हुआ कि अगर 14 सीट से कम की वैकेंसी निकलती है तो नियमवार आरक्षण को समाप्त समझिए।
सरकार और छात्रों/युवाओं का प्रतिरोध
अगर हम EVM, VVPAT के विवादों पर न जाएं तो गौरतलब है कि पिछले 04 सालों के चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन बहुत ही अच्छा रहा है। यानी कि इस हिसाब से सबकुछ ठीक चल रहा होगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। जिस डेमोक्रेसी, डेमोग्राफी एंड डेवलपेमेंट (3D) की बात हमारे प्रधानमंत्री साहब कर रहे हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण बात हमारे देश के युवा ही हैं। लेकिन बेहद अफसोस की बात है कि एनडीए सरकार में युवाओं के ऊपर सबसे ज्यादा हमले बढ़े हुए हैं। कभी आईआईटी मद्रास के 'आम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्कल' से जुड़े छात्रों पर हमला होता है तो कभी हैदराबाद विश्वविद्यालय के 'आम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन' से जुड़े छात्र रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या की जाती है। कभी एफटीआईआई पुणे के छात्रों का दमन किया जाता है तो कभी पंजाब विश्विद्यालय के आंदोलनरत छात्रों पर विश्विद्यालय प्रशासन द्वारा बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज किया जाता है। जेएनयू के छात्र नजीब को सरकार अभी तक ढूंढ नहीं सकी है। एमएनएनआईटी, इलाहाबाद के परमात्मा यादव कॉलेज प्रशासन से तंग आकर सुसाइड करने पर मजबूर होते हैं। BHU में छात्राओं के साथ छेड़खानी की जाती है तो इसके विरोध में खड़ी छात्राओं के चरित्र पर सवाल खड़ा किया जाता है। साहब क्या यही विकास है?
इस सर्कुलर के पीछे साजिश क्या है?
वर्तमान में देश के सभी विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में विभागों की जमीनी सच्चाई यह है कि अभी देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में विभागवार औसतन वैकेंसी 2- 4 की संख्या में निकलती हैं। अर्थात अगर निष्कर्ष निकालें तो आरक्षण का 49.50% मानक तो बना रहेगा लेकिन व्यवहार में आरक्षण का फायदा अब इक्का दुक्का मिलेगा बस। दूसरे शब्दों में कहें तो आरक्षण अब सवर्ण कैटेगरी के लोगों को दे दिया गया है। करीब 06 महीने पहले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने चेतावनी दिया था कि "आरक्षण तो रहेगा लेकिन हम आरक्षण को इतना कमजोर कर देंगे कि इसका होना न होना बराबर है।" आज भाजपा ने इस चेतावनी को सच कर ही दिया। साजिश को समझने की जरूरत है।
देश के सभी बहुजनों, बहुजन नेताओं, छात्रों तथा इंसाफ पसंद लोगों, संगठनों व राजनीतिक दलों से अपील है कि वह भाजपा की इस निरंकुश फरमान का विरोध कर वापस कराएं वर्ना वह दिन दूर नहीं जब यह रोस्टर प्रणाली सभी प्रकार की नौकरियों में लागू कर दिया जाएगा, जब संविधान भी इसी तरह पूर्णतः खत्म कर दिया जाएगा और आप देखते रहेंगे। अभी समय है। जितना जल्दी जाग सको जग जाओ और कमर कसते हुए संगठनबद्ध होकर संघर्ष करें।
- सूरज कुमार बौद्ध, राष्ट्रीय महासचिव,
भारतीय मूलनिवासी संगठन (BMS)
लहू प्रवाह हर नस में बहती है,
एक रिश्ता जो कभी खफा नहीं होती।
यह जीवन मातृत्व हेतु न्योछावर बारंबार,
सबल बनाने वाली मां अबला नहीं होती।
प्यारी दीदी तेरी आंखों में असीम स्नेह है,
पर बिन तेरे नोकझोंक झगड़ा नहीं होती।
बचपन से जिस आंगन में साथ पले-बढ़े,
घर छोड़ ससुराल जाती बहन अबला नहीं होती।
जब से बगावत कर बैठी जो नूर-ए-महल,
वह जीवनसाथी रूह से जुदा नहीं होती।
कभी हताश हुआ तो मेरी प्रेरणा बनकर समझाए,
ऐसी पत्नी-प्रेमिका कभी अबला नहीं होती।
इंसानियत की दुनिया में इंसान बनो भाई,
मां-बहन-पत्नी कोई अबला नहीं होती।
- सूरज कुमार बौद्ध,
(रचनाकार भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
#InternationalWomensDay
#internationalwomensday2018
तुमने मूर्तियां तोड़ी मैं फिर भी खड़ा हूं, देखो नफरत मैं तुमसे कितना बड़ा हूं। हमारी मूर्तियों को तोड़ना तुम्हारी चिढ़ नहीं हताशा है कि हमारे विचार कहीं तुम्हारे धर्माधारित धंधे को चौपट न कर दे।
तुम हमारी मूर्तियां तोड़ते हो क्योंकि हम अपने खून पसीने की मोल का पाई-पाई हिसाब मांगते हैं, क्योंकि हम उन धर्मशास्त्रों को धिक्कारते हैं, जो हमारे कान में पिघला शीशा डालना जायज ठहराता है, जो हमारे जिह्वा को काट देना दैवीय आदेश बताता है।
हम किसी के खिलाफ नहीं, बिल्कुल नहीं लेकिन जो धर्मशास्त्र हमें अपमानित करे, हमारे स्वाभिमान के साथ खेल खेले हम उन धर्म शास्त्रों को विषवृक्ष ठहराते हैं।
तुम्हें डर है इसी बात से कि कहीं तुम्हारी हराम की कमाई हमारे हिस्से न आए, कहीं धन धरती का बंटवारा न हो जाए। तुम्हारी हैसियत नाजायज है, अतः तुम्हारा डर जायज है।
खैर तुम तोड़ते रहो हमारी विरासत को और हम पुनः दर पुनः सृजित करते रहेंगे। हम केवल एक मूर्ति नहीं हैं, एक विद्रोह हैं जो इन शोषक धर्मशास्त्रों में डायनामाइट लगाने को प्रतिबद्ध हैं।
- सूरज कुमार बौद्ध (रचनाकार भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी के राष्ट्रीय अधिवेशन 11 फरवरी 2018 को भोपाल में महत्वपूर्ण निर्णयों के साथ सम्पन्न हुआ।
1. राष्ट्रीय कार्यकरणी तत्काल प्रभाव से भंग।
2. राष्ट्रीय स्तर पर सोशल मीडिया में सक्रिय अम्बेडकरवादी साथियो का आईटी सेल बनाया जायेगा।
3. संगठन के आयोजनों में जो भागीदारी लगातार निभा रहे हैं अब वह ही संगठन की महत्वपूर्ण जवाबदारी निभाएंगे।
4. अगला राष्ट्रीय अधिवेशन बिहार में प्रस्तावित हैं।
5. संवैधानिक शब्दो का प्रचार-प्रसार किया जायेगा और दलित और हिंदुस्तान जैसे गैरसंवैधानिक शब्दो को प्रतिबंधित करने की माँग, इसके अतिरिक्त अन्य कई विषयों पर भी चर्चा हुई।
इस आयोजन की अध्यक्षता संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता माला दास ने की।
मुख्य अतिथि भंते विनय (बैंगलोर) विशिष्ट अतिथि इंडोनेशिया के भंते रहे।
सुरेश पासवान, गजेंद्र कुमार, राकेश महाले, राजू कपसे, नागमणी कुमार, कृष्णकांत चौरासे, उत्कर्ष जामभूलकर, सुनील गायकवाड़, आकाश सोनिया, सुग्रीव चौधरी, अजित कुमार, दीनानाथ दिवाकर, संतलाल चौधरी, कुंवरजीत सिंह, रविंद्र पाल सिंह, कुसुम चौकीकर, कैलाश चौकीकर और राष्ट्रीय परिवारिक धम्म संगोष्टी के मिलिन्द बौद्ध के अतिरिक्त भारत के विभिन्न प्रदेशों से आये बौद्ध अनुयायियों की गरिमामयी उपस्तिथि में अधिवेशन ऐतिहासिक रूप से सम्पन्न हुआ।
अशोक बुद्ध विहार समिति भोपाल के सभी पदाधिकारियों ने सहयोग प्रदान किया जिसमें अभिमान सोनवाने जी का सहयोग उल्लेखनीय हैं।
प्रबुद्ध भारत अभियान को कैसे गति दिया जाये इस विषय पर भंते विनय एंव मिलिन्द बौद्ध का उद्बोधन देश के विभिन्न हिस्सों से आये युवक युवतियों ने सराहना की साथ ही संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष माला दास ने साइबर क्राईम कानून की जानकारी दी साथ ही सोशल मीडिया द्वारा संवैधानिक दायरे में रहते हुए कैसे देश मे संविधान के प्रति जागरूकता लाया जा सके इस विषय पर जोर दिया उन्होंने ने हमारे महापुरुषों के वैचारिक आंदोलन को तेज करने के लिए युवक युवतियों को मार्गदर्शन भी दिया।
सुरेश पासवान, राष्ट्रीय महासचिव ने सोशल मीडिया को कैसे मेनस्ट्रीम मीडिया से बड़ा मीडिया बनाये और तकनीकी प्रशिक्षण दिया।
सभी पदाधिकारियों ने अपने अपने संक्षिप्त रूप में विचार भी रखे।
मंच संचालन राकेश महाले , प्रदेश अध्यक्ष(म.प्र) वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी ने किया।
साथ ही उन्होंने समाजिक आंदोलन के साथ राजनीति में भागीदारी पर जोर भी दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा पकौड़े बेचने को रोजगार की परिभाषा में शामिल किए जाने संबधी बयान देकर युवाओं के उम्मीदों और भावनाओं के साथ मजाक उड़ाए जाने पर युवा सामाजिक चिंतक सूरज कुमार बौद्ध ने एक गीत "हमारे पीएम पकौड़ेबाज़" लिखकर युवाओं की भावनाओं को व्यक्त किया है। आइए पढ़ते हैं...
हमारे पीएम पकौड़ेबाज
चाय चाय करते करते बन गए जुमलेबाज,
हमारे पीएम पकोड़ेबाज, हमारे पीएम पकोड़ेबाज......-2
फर्जी डिग्री वाले पीएम की, झूठ-मूठ अल्फाज सुनो।
ट्वीट-ट्वीट से मन ना भरे तो, साहब के मन की बात सुनो।
छात्र नौजवानों की अब, सुनो तो मन की बात...
हमारे पीएम पकोड़ेबाज, हमारे पीएम पकोड़ेबाज......-2
नोटबंदी और जीएसटी की, मार तेरी उपलब्धि है
फर्जिकल स्ट्राइक करने वाली, हर बातें गीदड़भभकी है
वंचित गरीब किसानों पर बेईमानों का राज....
हमारे पीएम पकोड़े बाज, हमारे पीएम पकोड़ेबाज......-2
दो करोड़ की नौकरी, हर साल देने वाले थे,
15 लाख सबके खाते में, स्विस बैंक से लाने वाले थे
गजब के अर्थशास्त्री हो तुम, गजब तेरा विकास...
हमारे पीएम पकोड़े बाज, हमारे पीएम पकोड़ेबाज......-2
अच्छे दिन की बात करके, लाइन में लगवा दिए,
आधार कार्ड के चक्कर में, संतोषी को मरवा दिए,
कासगंज में दंगे करवाके, देखो खुले घूमें सांड......
हमारे पीएम पकोड़े बाज, हमारे पीएम पकोड़ेबाज......-2
- सूरज कुमार बौद्ध
जैसा कि आप जानते है इस वक्त न्यायपालिका की विश्वनीयता पर बहस गर्म हैं कारण सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जे. चेलामेश्वर के साथ दूसरे वरिष्ठ न्यायाधीशों ने शुक्रवार को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए.
जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को नहीं बचाया गया तो लोकतंत्र नाकाम हो जाएगा.
सोशल मीडिया में कल से इसी मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई हैं वरिष्ठ पत्रकार एंव पूर्व इंडिया टुडे के सम्पादक दिलीप मंडल ने अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा है कि
"माननीय चार जजों, आपका लोकतंत्र अब खतरे में पड़ गया है, जब जस्टिस मिश्रा मतलब के सारे केसेस अपनी पसंद के जजों को सौंप दे रहे हैं.
आप चारों जज सात जजों की उस बैंच में थे, जिसने जस्टिस कर्णन के खिलाफ फैसला सुनाया था.
जस्टिस केहर, मिश्रा और घोष के साथ उस बेंच में चलमेश्वर, लोकुर, जोसफ और गोगोई भी थे.
उस समय अगर चलमेश्वर, लोकुर, जोसफ और गोगोई ने अपनी रीढ़ की हड्डी दिखा दी होती, तो आज ये नौबत न आती.
लोकतंत्र की थोड़ी परवाह कर्णन केस में कर ली होती, तो आज न आपकी इज्जत इस तरह नीलाम होती, न न्यायपालिका की इस तरह फजीहत होती.
सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण विरोधी अब तक के हर फ़ैसले में आपको किसी न किसी ब्राह्मण जज के दस्तखत दिखेंगे.
सुप्रीम कोर्ट में इस समय एक भी दलित जज नहीं है. न्यायपालिका एक मंदिर है, जहाँ दलित सिर्फ दक्षिणा देने जाता है. पुजारी कोई और है."
वही सुरेश पासवान, राष्ट्रीय महासचिव वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी ने फसेबूक पर लिखा है कि "सेल्यूट कीजिए बाबासाहेब की कलम से निकले पूर्व जस्टिस कर्णन को जिन्होंने पूर्व में ही न्यायलय की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े कर दीए थे तब उनकी बातों को मीडिया ने तवज्जों नही दिया था.
आज सुप्रीम कोर्ट के चार जज फिर इसी मुद्दे को लेकर देश के सामने आये हैं.
अब यकीन हुआ यह देश मनु विधान की ओर बढ़ रहा है."
और भी कई तथ्यात्मक एंव तात्कालिक प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं.
आप सबों के नाम ये पत्र लिख रहा हूँ और याद कर रहा हूँ अन्याय और ग़ैर बराबरी के खिलाफ अपने लम्बे सफ़र को, हासिल हुए मंजिलों को और ये भी सोच रहा हूँ कि अपने दलित पिछड़े और अत्यंत पिछड़े जनों के बाकी बचे अधिकारों की लड़ाई को.
बचपन से ही चुनौतीपूर्ण और संघर्ष से भरा रहा है जीवन मेरा। मुझे वो सारे क्षण याद आ रहे हैं जब देश में गरीब पिछड़े शोषित और वंचित लोगों की लड़ाई लड़ना कितना कठिन था। वो ताकतें जो सैकड़ों साल से इन्हें शोषित करती चली आ रही थी वो कभी नहीं चाहते थे कि वंचित वर्ग के हिस्से का सूरज भी कभी जगमगाए। लेकिन पीड़ितों की पीड़ा और सामूहिक संघर्ष ने मुझे अद्भुत ताकत दी और इसी कारण से हमने सामंती सत्ता के हजारों साल के उत्पीड़न को शिकस्त दी. लेकिन इस सत्ता की जड़ें बहुत गहरी हैं और अभी भी अलग अलग संस्थाओं पर काबिज़ हैं.
आज भी इन्हें अपने खिलाफ उठने वाला स्वर बर्दास्त नहीं होता और येनकेन प्रकारेण विरोध के स्वर को दबाने की चेष्टा की जाती है. आप तो समझ ही रहे होंगे कि छल, कपट, षड्यंत्र और साजिशों का ऐसा खेल खेला जाता है जिससे सामाजिक न्याय की धारा कमज़ोर हो और इस धारा का नेतृत्व करने वाले लोगों का मुंह बंद कर दिया जाए. इतिहास गवाह है कि मनुवादी सामंतवाद की शक्तियां कहाँ कहाँ और कैसे सक्रिय होकर न्याय के नाम पर अन्याय करती आई हैं. शुरू से ही इन शक्तियों को कभी हजम नहीं हुआ कि एक पिछड़े ग़रीब का बेटा दुनिया को रास्ता दिखाने वाले बिहार जैसे राज्य का मुख्यमंत्री बने। यही तो जननायक करपुरी ठाकुर के साथ हुआ था।
मुझे बचपन की वो सामजिक व्यवस्था याद आ रही जहाँ ‘बड़े लोगों’ के सामने हम ‘छोटे लोगों’ का सर उठाकर चलना भी अपराध था. फिर बदलाव की वो बयार भी देखी जिसमें असंख्य नौजवान जे.पी के आंदोलन से प्रभावित हो उसमे शामिल हो गए. आपका अपना लालू भी उनमें से एक था जो कूद पड़ा था सत्ता के खिलाफ संघर्ष में, और निकल पड़ा तानशाही, सामंतवाद और भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध लौ जलाने. सफ़र में अनगिनत मुश्किलें थी लेकिन काँटों भरी इस यात्रा ने आपके लालू को और उसके इरादों को और मज़बूत किया.
आपातकाल के दौरान आपके इसी नौजवान को जेल में डाल दिया गया था, लौ चिंगारी में जहाँ परवर्तित हुई थी वो जेल ही थी और आज महसूस करता हूँ की वो चिंगारी अब ऐसी मशाल बन चुकी है जो जब तक रोशन रहेगी, तानशाही और सामंतवादी के खिलाफ लोगो को जगाने का काम करेगी। भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर की भी यही इच्छा थी तथा इन्हीं उद्देश्यों के किए डॉ लोहिया, स्व जगदेव बाबू, स्व चौधरी चरण सिंह, जननायक करपुरी ठाकुर तथा वीपी सिंह ने समय-समय पर इस संघर्ष को मज़बूत किया था।
सच कहूं तो जिस दिन आंदोलन में कूदा था उस दिन से ही मुझे आभास था की राह आसान नहीं होगी, जेल में डाला जायेगा, प्रताड़ित किया जाएगा, झूठे आरोपों की बरसात होगी, झूठे तमगे दिए जायेंगे लेकिन एक बात तय थी कि मेरी व्यक्तिगत परेशानी गरीब और वंचित जनता की सामूहिक ताकत को बलवती बनाकर सामाजिक न्याय की धारा के लोगों की राह आसान बनाएगी. आप लोग मेरे लिए परेशान ना हों मेरी एक-एक कुर्बानी आपको मजबूती देगी. किसी की मजाल नहीं की आपके हिस्सेदारी से कोई ताकत आपको महरूम कर दे. आपकी लड़ाई, आपका संघर्ष और मेरे लिए आपका प्रेम ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है और मैं आपके लिए सौ वर्षों तक जेल में रहने को तैयार हूँ. सामाजिक-राजनितिक व्यवस्था में आपकी सम्पूर्ण भागीदारी की ये छोटी सी कीमत हैं और मैं और मैं इसे चुकाने को तैयार हूँ.
जब मैं जातिगत जनगणना के खुलासे की बात करता हूँ, आरक्षण के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ता हूँ। किसान, मज़दूर और ग़रीबों की आवाज़ बुलंदी से उठाता हूँ तो सत्ता की आँखों में खटकता हूँ, क्यूंकि निरकुंश सत्ता को गूंगे-बहरे चेहरे चाहिए। इस सत्ता को ‘जी हाँ हुज़ूर’ वाले लोग चाहिए जो आपका लालू कभी हो नहीं सकता. क्या हम नहीं जानते हैं कि तानाशाही सत्ता को विरोध की आवाज़ हमेशा खटकती है, इसलिए उसका जोर होता है की साम-दाम-दंड-भेद से उस आवाज़ को खामोश कर दिया किया जाए। लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए विरोध का स्वर जरूरी है। आपका लालू अपने आखिरी दम तक आवाज़ उठाता रहेगा। जो बिहार के हित में है, जो देशहित में हैं , गरीबों, पिछड़ों, दलितों के हित में है और सबसे आगे जो मानवता के हित में है। लालू ने हमेशा वो किया और करता रहेगा. .... और मैं ये सब इसलिए कर पाया हूँ और करता रहूँगा क्योंकि मेरी ताकत आप करोड़ों लोग हैं..खेत-खलिहानों में, मलिन बस्तियों में, शहर और गाँव की गुमनाम बस्तियों में...
लालू का रास्ता सच के लिए संघर्ष का रास्ता है इसलिए हमारे लिए जनता ही जनार्दन है और उसकी बेहतर ज़िन्दगी ही मेरे जीवन का ध्येय है ना की कुर्सी। यही वजह है आडवाणी का रथ रोकते हुए मैंने सत्ता नहीं देखी, मेरे ज़मीर ने कहा की ये रथ बिहार के भाईचारे को कुचलता है, तो रोक दिया रथ ...
कितना कुछ खेल खेला है इन मनुवादियों नें ....CBI पीछे लगाई, मेरे परिवार को घसीटा गया, मुझे अरेस्ट करने के लिए आर्मी तक बुलावा भेजा। मेरे नादान बच्चों पर मुक़दमे कर उन्हें प्रताड़ित कर उनका मनोबल तोड़ने का कुचक्र रचा, देश की सभी जाँच एजेन्सीयों के छापे, चूल्हे से लेकर तबले तक को झाड़-पोंछकर खोजबीन की, पूछताछ की। चरित्रहनन करने के षढयंत्र रचे, सभी नज़दीकियों को प्रताड़ित किया, चोर दरवाज़े से घुसकर सत्ता से बेदखल किया....लेकिन परेशानियाँ और प्रताड़ना अपनी जगह आपके लालू के चेहरे पर शिकन नहीं आई.. जानते हैं क्यों..क्योंकि जिसके पास करोड़ों ग़रीबों की बेपनाह मुहब्बत हो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता.
आप तो देख ही रहे हैं किस प्रकार देश का प्रधानमंत्री, राज्य का मुख्यमंत्री, केंद्र और राज्य की सरकारें, देश की तीन सबसे बड़ी एजेन्सीयाँ इनकम टैक्स, सीबीआई और ईडी, सरकार समर्थित अन्य संस्थान और कई प्रकार के ज़हरीले लोग हमारे पीछे लगे हैं. बच्चों को भी झूठ और फरेब की कहानियाँ बनाकर दुश्मनी निकाल रहे है। इन मनुवादियों ने सोचा इतना करने के बाद अब तो लालू खामोश हो जायेगा, समझौता कर लेगा लेकिन लालू बिहार की महान माटी का लाल है किसी अत्याचार के खिलाफ खामोश नहीं होने वाला।
लालू किसी से डरकर नहीं डटकर लड़ाई लड़ता है। वह आँखों में आँख नहीं ज़रूरत पड़ने पर आँखो में ऊँगली डालकर भी बात करना जानता है। और ये कर पाने का बल और उर्जा आपकी ताकत, आपके संघर्ष और मेरे लिए आपके असीम स्नेह के कारण संभव हो पाता है. आप हैं तो आपका लालू है.
हाँ आपके लालू का एक दोष ज़रूर है कि उसने जातिवाद और फासीवाद की सबसे बड़ी पैरोकार संस्था आरएसएस के सामने झुकने से लगातार इनकार किया. इन मनुवादियों को ये पता होना चाहिए कि करोड़ों बिहारियों के स्नेह की पूँजी जिस लालू के पास है उसे पाताल में भी भेज दो तो वहां से भी तुम्हारे खिलाफ और तुम्हारी दलित-पिछड़ा विरोधी मानसिकता के खिलाफ बिगुल बजाता रहेगा.
क्या आप नहीं समझते कि इन मनुवादियों को अपनी सत्ता का इतना घमंड हो गया है कि भैस-गाय पालने वाले, फक्कड़ जीवनशैली अपनाने वाले आपके लालू को घोटालेबाज़ कहते हैं. ज़िन्दगी भर गरीब आदमी के लिए लड़ने वाले के सिर पर इतनी बड़ी तोहमत के पीछे का सच क्या किसी से छुपा हुआ है? अरे सत्ता में बैठे निरंकुश लोगो!! असली घोटालेबाज तो तुम हो जो कमल छाप साबुन से बड़े बड़े घोटालेबाजों की ‘समुचित’ सफाई कर उन्हें मनुवादी-फासीवाद का सिपाही बनाते हो..
मेरे भाइयों और बहनों! परेशान और हताश न होयें आप.. बस ये ज़रूर सोचना और बार-बार सोचना कि ‘तथाकथित’ भ्रष्टाचार के सभी मामलों में वंचित और उपेक्षित वर्गों के लोग ही जेल क्यों भेजे जाते है? ये भी सोचना ज़रूर कि कुछ हमारे जमात के लोग इनके दुष्प्रचार का शिकार क्यों हो जाते है? ये सारी नापाक हरकते और पाखंड सिर्फ लालू को प्रताड़ित करने के लिए नहीं हो रहा है बल्कि इनका असली निशाना आपको सत्ता और संसाधन से बेदखल करना है. लालू तो बहाना है असली निशाना है कि दलित,महादलित,पिछड़े-अतिपिछड़ों और अल्पसंख्यकों को फिर से हाशिये पर धकेल दिया जाए.
आप में से कई लोग सोचते होंगे कि आपका लालू चुप क्यों नहीं हो जाता, समझौता क्यों नहीं कर लेता ?
तो सुन लो .... आपका लालू आज भी ज़मीन पर ग़रीब के बीच रहता है और देखता है कि किस कदर लोगो को सताया जा रहा है। आज भी दलित-पिछड़े समाज की हर मुसीबत मेरी व्यक्तिगत मुसीबत है. आज भी इन वर्गों की हर परेशानी मुझे चैन से सोने नहीं देती. मैं मानता हूँ कि ,”कदम कदम पर पहरे है , सत्ता तेरे गरीबों को दिए ज़ख्म बहुत गहरे हैं”। शायद इसलिए बाकी लोगो की तरह आपका लालू भी अगर समझौता कर सत्ता की गोद में बैठ जायेगा तो बेबस जनता की आवाज़ कौन सुनेगा, उनके हक़ के लिए कौन लड़ेगा? लालू को लोकतंत्र की परवाह है इसलिए बोलता है , लालू को भाईचारे की परवाह है इसलिए बोलता है।
झूठ अगर शोर करेगा
तो लालू भी पुरज़ोर लड़ेगा
मर्ज़ी जितने षड्यंत्र रचो,
लालू तो जीत की ओर बढ़ेगा
अब, इंकार करो चाहे अपनी रज़ा दो
साज़िशों के अंबार लगा दो
जनता की लड़ाई लड़ते हुए, आपका
लालू तो बोलेगा चाहे जो सजा दो
मैं सिर्फ हाथ जोड़कर आप सबों से विनती करता हूँ कि आप हताश और निराश ना हों... आप रोये नहीं.. जैसा मैंने पहले कहा कि आपका स्नेह और मुहब्बत आपके लालू को ताकत देता हैं...आपकी परेशानी से आपका लालू परेशान होता है. भरोसा देता हूँ कि मुझे डर नहीं, मुझे भय नहीं। मेरे साथ समूचा बिहार है। आप सब मेरे परिवार हैं... जिस व्यक्ति के पास इतना बड़ा करोड़ों लोगों का परिवार हो उसे दुनिया की कोई ताकत डरा नहीं सकती। आपकी ताक़त ही आपके लालू को लालू बनाती है।
56 इंची परिभाषा
हम डरते नहीं सलाखों से,
कल भी आए थे लाखों से।
ले देख तू अपनी आंखों से
हम फिर आए हैं लाखों से।
बनेगी बात नहीं जब बातों से,
हम फिर आएंगे लाखों से।
अखलाक, रोहित, ऊना
सहारनपुर, खगड़िया, कोरेगांव....
यह श्रृंखला जल्द ही टूटकर
नवीन क्रांति की ओर
मुखर हो रही है !
अब हमारी चीत्कार
हुंकार का रूप ले रही है।
तुम्हारी जेल की कोठरियां
और हमारी बेसुध सिसकियां
हमें और कतारबद्ध कर
मजबूत कर रही है।
अबकी आवाज और भी बुलंद होगा
एक राज्य नहीं पूरा भारत बंद होगा।
और तब तक बंद रहेगा जबतक
हमारे बेबाकी पर कोई पहरा न रहे।
अब दो मिनट की शांति का दौर
हमारे तरीके में नहीं रहा।
अब अशांति होगी जबतक
कोई जन्मजात छोटा बड़ा न हो।
हमारे अपने शौर्य पर
बौखलाना तुम्हारी फितरत है।
क्या हमें तुम आतंकियों के
आदेश की जरूरत है?
उन्हीं आतंकवादियों का,
जिनकी अकड़ 1818 के रण में
चूर चूर हो गई थी।
जब पेशवाओं की पेशवाई
सिसक सिसक तड़प मरी थी।
हमें कोरेगांव युद्ध पर गुमान है,
हां, शौर्य दिवस हमारी पहचान है।
तुम वंदे मातरम कहते हुए
छिपकर वार करते हो।
अपनी कायरता का प्रदर्शन कर
वीरता शर्मशार करते हो।
भीमा कोरेगांव का नाम सुनते ही
तुम कांप क्यों उठते हो
क्योंकि
भीमा कोरेगांव एक नाम है
जुल्म ज्यादती का प्रतिकार करते हुए
56 इंची परिभाषा गढ़ने का।
- सूरज कुमार बौद्ध,
(रचनाकार भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)