Friday, 30 June 2017

मध्यप्रदेश से फिर आई चौकाने वाली खबर कलेक्टर को न्यूनतम कृषि मजदूरी की जानकारी नही है..

मण्डलेश्वर | विगत दिनों पूर्व मध्यप्रदेश के खरगोन जिले की महेश्वर तहसील के ग्राम कोदलियाखेड़ी में कुछ उच्च जाति वर्ग के लोगों ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोगो का हुक्का-पानी बंद कर दिया था।
जिसको लेकर क्षेत्र मे अजा/अजजा वर्ग के लोगो मे रोष व्याप्त था।

मामला क्या था यह जानने के लिए देखिये यह वीडियो

जय भीम सैनिक संगठन, वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी सहित महेश्वर, मण्डलेश्वर, खरगोन, पिपल्याबुजुर्ग, करही, बड़वाह के मजदुरो सहित कई अन्य सामाजिक संगठनो ने पिपल्याबुजुर्ग स्कूल ग्राउण्ड मे धरना स्थल से रैली निकालकर राज्यपाल के नाम तहसीलदार रंजना पाटीदार को ज्ञापन सौपा व अपनी माँगो को बताया कि पूरे प्रदेश मे मजदुरो को शासकीय दर अनुसार कृषि मजदूरी की राशि दी जावे। ज्ञात हो कि मजदुरो ने इस धरना प्रदर्शन के लिए स्वीकृती मॉगी थी जिसको लेकर एक दिन पूर्व ही कलेक्टर अशोक वर्मा व पुलिस अधिक्षक कल्याण चक्रवती ग्राम कोदल्याखेड़ी पहुचे थे।

और वहाँ पर किसानो व मजदुरो को एकत्रीत कर मजदुरी कि समस्या को लेकर दोनो वर्गो की समस्या सुनकर मौके पर ही राजीनामा कराया था और साथ ही अजा/अजजा वर्ग के लोगो की बात को मानते हुए उन्हें न्यूनतम कृषि मजदूरी दर 171 रुपये देने पर सहमति बनी।

जबकि ज्ञात हो कि श्रमायुक्त कार्यालय मध्यप्रदेश शासन के अनुसार न्युनतम कृषि मजदूरी 200 रुपए प्रतिदिन है । यह बात वहाँ पर उपस्थित जाग्रत आदिवासी संगठन बडवानी की माधुरी बेन ने बताया और उन्होंने कहा कि कलेक्टर को न्यूनतम कृषि मजदूरी की जानकारी नही है यह आश्चर्यजनक है यदि कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक को इसकी जानकारी नही थी तो उन्हें इसकी जानकारी प्राप्त कर लेना था कि वर्तमान में मजदूरों को श्रमायुक्त के द्वारा कितनी राशि दी जा रही है।
  क्योकि आज जो श्रमायुक्त कि गाइडलाईन के हिसाब से अकुशल मजदुरो से 8 घंटे काम लेकर उन्हे 200 रू. प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी देना चाहिए जबकि यहाँ पर ऐसा कुछ नही हुआ और कलेक्टर ने श्रमायुक्त के पुरानी मजदूरी दर ही बताकर दोनो वर्गो में समझोता करवा दिया । मजदुर संघ ने कहा कि कलेक्टर साहब को श्रमायुक्त कि नई कृषी मजदूरी दर का पता ही नही है । इस बात को लेकर क्षैत्र के मजदूरों सहित मजदूर संघ कार्यकर्ता माधुरी बैन एवं उपस्थित सभी संगठनो ने  कलेक्टर पर कारवाई की मांग की है ।
इंजी. राहुल करोडे, जिलाध्यक्ष डब्ल्यू एल बीएस

वही इंजी. राहुल करोड़े, जिलाध्यक्ष खरगोन वी लव बाबासाहेब ने कहा कि कृषि प्रधान देश मे किसान व कृषि मजदूरों के साथ शासन-प्रशासन का यह रवैया शर्मनाक है।
यदि कृषि मजदूरों को न्याय नही मिला तो हम प्रदेश की राजधानी में बड़ा आंदोलन करेंगे।

अब देखना है कि मजदूरों को उनका हक मिलेगा या यूं ही चक्कर काटते रहेंगे?







Thursday, 29 June 2017

बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया में वैदिक धर्म का उदय हुआ था ।

यदि बौद्ध धर्म का उदय वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था तो इसका उदय पश्चिमोत्तर भारत में होना चाहिए था। पश्चिमोत्तर भारत में वैदिक धर्म का प्रभाव अधिक था और आगे भी रहा।

मगर उलटा हुआ । बौद्ध धर्म का उदय पूर्वी भारत में हुआ, जहाँ वैदिक प्रभाव कम था।

सिंधु घाटी की सभ्यता बौद्ध सभ्यता थी। यह पश्चिमोत्तर में थी । इसी पश्चिमोत्तर बौद्ध सभ्यता की प्रतिक्रिया में वैदिक धर्म का उदय पश्चिमोत्तर भारत में हुआ।

इसीलिए यह कहना सही होगा कि वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में बौद्ध धर्म का उदय नहीं हुआ था बल्कि बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया में वैदिक धर्म का उदय हुआ था ।
लेखक: डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह, भाषा वैज्ञानिक


Saturday, 24 June 2017

वीरांगना रानी दुर्गावती की शहादत को देश ने क्यो भूला दिया गया?


वीरांगना रानीदुर्गावती जी की जयंती पर हम शत् शत् नमन करते हैं।
रानी दुर्गावती (5 अक्टूबर, 1524 – 24 जून, 1564)) भारत की एक वीरांगना थीं जिन्होने अपने विवाह के चार वर्ष बाद अपने पति दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद अपने पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बैठाकर उसके संरक्षक के रूप में स्वयं शासन करना प्रारंभ किया।
देखिये यह वीडियो:

वीरांगना रानी दुर्गावती  (1524-1564)

भारत के इतिहासकारों के लिए गोंडवाना भू-भाग भारत के आदिवासी वीर सपूतों, महान नारियों की वीरगाथाओं का आलेखन इतिहास के पन्नों पर जरूर दुर्लभ हो सकता है. परन्तु गोंडवाना के आदिम जनजातीय ­­वंशज (गोंडवाना साम्राज्य) के अनेक योद्धाओं, राजा-महाराजाओं तथा कई वीर बालाओं से लोहा लेने वालों को उनकी अदम्य साहस और वीरता जरूर याद आई, जिन्होंने उनके सामने रणभूमि में घुटने टेके. आदिवासी समाज धन्य है, जिसने इतिहास में कई वीर योद्धाओं बिरसा मुंडा एवं वीर नारियों को जन्म दिया. जैसे- महारानी कमलावती, जाकुमारी हसला, रानी देवकुँवर, रानी तिलका, जयबेली रानी मोहपाल, रानी कमाल हीरो, रानी हिरई, रानी फूलकुंवर, रानी चमेली, वीरांगना सिंनगीदयी आदि. गोंडवाना की वीरांगनाएं वो माताएं है, जिनकी समृद्ध कर्मभूमि का नाम "गोंडवाना" रही है. इसी समृद्ध गोंडवाना भूमी की गर्भ से प्रतापी, विलक्षण, प्रतिभाशाली, संस्कारवान लोग और “भारत देश” पैदा हुए.

लोग अपने पूर्वजो की वीरगाथाओं को अपने समुदाय तथा समाज के इतिहास से पाया है, किन्तु गोंडवाना के उन पूर्वजों का जिन्हे इतिहास ने भूला दिया. यह तो इतिहासकरों की पराकाष्ठा का मिसाल है कि ऐसे पूर्वज, जिन्होंने भारत ही नही, दुनिया के पांच भू-खंडो में सदियों सदी तक अपने कर्म और कर्तव्य से मानवजाति को स्थायित्वता प्रदान किया, उन्हें उनकी धरा के इतिहास में ही गुमनाम बना दिया गया ! यदि युगान्तर में उनकी वीरता दिखाई भी गई तो दास-दस्यु, बंदर-भालू, दैत्य-दानव, राक्षस तथा बुराई के रूप में ! गोंडवाना के आदिकालीन पृष्ठभूमि में आदिवासियों के पूर्वजों के वंशज, गढ़मण्डला(जबलपुर म.प्र), जिसे गढ़ा मंडला भी कहा जाता है, की कर्मवती, धर्मवती, बलवती, रणवती, एवं रणगति प्राप्त करने वाली “वीरांगना रानी दुर्गावती” थी, जिनकी आज २४ जून को 452वीं पुन्यतिथि देश का आदिम मानव समाज प्रतिवर्ष की भांति मना रहा है.

विस्तृत गोंडवाना भू-भाग के प्रतापी राजाओं, रानियों के संबंध में कुछ-कुछ विदेशी इतिहासकारों ने अपनी दिलचस्पी दिखाई, जिससे उनके इतिहास की कुछ झाकियां देखी जा सकी. विदेशी इतिहासकारों को गोंडवाना के मानव समाज, उनकी संस्कृति, बोली-भाषा, संस्कृति, साहस, वीरता आदि के बारे में जितनी समझ आई और जानकारी हासिल हो सकी, उन्होंने बखूबी सहेजा, जिसके कारण आज भारतीय मूलनिवासी समाज को उनके ऐतिहासिक पदचाप के निशां मिल सके.

एक झलक वीरांगना दुर्गावती पर:

अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में गोंडवाना पर हमला कर दिया. एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ, पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला. दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया. इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये लेकिन रानी की भी अपार क्षति हुई थी।
अगले दिन 24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला. आज रानी का पक्ष दुर्बल था, अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा, रानी ने उसे निकाल फेंका. दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया, रानी ने इसे भी निकाला पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया.
रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे, पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ. 
अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं. महारानी दुर्गावती ने अकबर के सेनापति आसफ़ खान से लड़कर अपनी जान गंवाने से पहले पंद्रह वर्षों तक शासन किया था.

जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, उस स्थान का नाम बरेला है, जो मंडला रोड पर स्थित है, वही रानी की समाधि बनी है, जबलपुर मे स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय भी इन्ही रानी के नाम पर बनी हुई है.
इस अदम्य साहस एंव वीरता को हम नमन करते है.

महापुरुषो के सच्चे इतिहास को जानने के लिए फसेबूक पेज को लाईक करिए एवं हमारे यूट्यूब चैनल को भी सब्सक्राइब करिये.

Friday, 23 June 2017

अमित शाह ने असंवैधानिक शब्द का इस्तेमाल कर बिहार राज्यपाल जी का अपमान किया?

देश के संवैधानिक पद पर बैठे महाअनुभवी सम्मानीय व्यक्ति अगर गैर संवैधानिक शब्द का प्रयोग करे तो (We The People Of India) भारत के नागरिकों का फर्ज है कि उसका प्रतिकार करे , क्योंकि संवैधानिक पद पर बैठे लोगों की वाणी सुन कर देश की जनता अपने भारत को महसूस करती है।

देखिये यह वीडियो एक अधिवक्ता ने इस विषय पर क्या कहा;

19 जून 2017 यानि सिर्फ 4 दिन पहले बिहार के महामहिम राज्यपाल जी के लिए बीजेपी के अध्यक्ष ने दलित शब्द का इस्तेमाल किया|
पूरा भारत स्तब्ध है कि महामहिम राज्यपाल जी को भी दलित शब्द के तराजू में तौल दिया गया।

क्या संवैधानिक पद पर बैठे लोग संवैधानिक आयोग का फैसला नहीं मानते? अनुसूचित जाति आयोग ने 2008 को ही दलित शब्द पर आपत्ति जताते हुए असंवैधानिक करार दिया।
माननीय मुम्बई उच्च न्यायालय में भी दलित शब्द का मामला विचाराधीन है।

फिर अमित शाह ने असंवैधानिक शब्दों का इस्तेमाल बिहार राज्यपाल जी के लिए क्यों किया?
क्या दलित शब्द सिर्फ वोट की राजनीति करने भर के लिए है?
ज्ञातव्य हो कि ;
Koयाचिकाकर्ता के अनुसार दलित शब्द आपत्तिजनक और असंवैधानिक है। इसके प्रयोग से जातिवाद और भेदभाव झलकता है। खुद बाबा साहब आंबेडकर ‘दलित’ शब्द के प्रयोग के विरोध में थे।
अनुसूचित जाति आयोग ने ‘दलित’ शब्द के प्रयोग को जातिवाचक और आक्षेपजनक माना है।
अपने ज्ञापन में याचिकाकर्ता ने लिखा है कि दलित शब्द के प्रयोग से संविधान के आर्टिकल 14,15,16,17,18,19,21, 341 का उल्लंघन होता है।
याचिकाकर्ता की अपील को माननीय न्यायालय में 29 अगस्त 2016 को सुनवाई हुई राज्य सरकार के अलावा इस मामले में याचिकाकर्ता ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और केंद्रीय सामाजिक न्याय व आधिकारिता विभाग को प्रतिवादी बनाया।
इस सुनवाई के बाद मुंबई उच्च न्यायलय की नागपुर खंडपीठ की भूषण धर्माधिकारी और अतुल चांदुरकर की दोहरी पीठ ने इस मुद्दे पर सरकार से तीन हफ्ते में अपना पक्ष रखने का आदेश दिया गया । लेकिन सरकार ने समय पर अपना पक्ष नहीं रख सकी।
नाराज हाईकोर्ट प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, केंद्रीय सामाजिक न्याय व आधिकारिता विभाग और राज्य सरकार को दो सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने के आदेश दिए है। याचिकाकर्ता पंकज मेश्राम की ओर से अधिवक्ता शैलेश नारनवरे ने पैरवी की गयी।

Thursday, 22 June 2017

म.प्र के खरगोन जिले में सहारनपुर जैसे हालात निर्मित हो रहे है??


धामनोद | 3 दिनों पूर्व मध्यप्रदेश के खरगोन जिले की महेश्वर तहसील के ग्राम कोदलियाखेड़ी में कुछ उच्च जाति वर्ग के लोगों ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोगो का हुक्का-पानी बंद कर दिया था |

जिसको लेकर क्षेत्र मे अजा/अजजा वर्ग के लोगो मे रोष व्याप्त है| पीड़ित लोगों के साथ "जय भीम सैनिक संगठन" बैठक की और निर्णय लिया कि ग्राम पिपल्या मे 25 जुन रविवार को होने वाले धरना प्रदर्शन किया जायेंगा।

यह था मामला -
कोदलियाखेड़ी गांव की अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओ ने मजदूरी बढ़ाने को कहा था इसी बात को लेकर कथित उच्च जाति के लोगो ने इनका हुक्का-पानी बंद कर दिया |
महिलाओं ने खरगोन मे रैली निकालकर विरोध प्रदर्शन कर एसपी को कार्रवाई हेतु आवेदन सौंपा था।
इसी दौरान प्रशासनिक अधिकारी बुधवार को गांव में पहुंचे वही स्थिति को देखा | बता दें कि यहां अजा/अजजा समुदाय के लोगो के मवेशीयो को भी दबंगो ने अपनी पाबंदी मे कर लिया था |
धरना प्रदर्शन मे जय भीम सैनिक संगठन, वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी सहित महेश्वर, मण्डलेश्वर, खरगोन, पिपल्या, करही, बड़वाह आदि संगठन ग्राम पिपल्या में उपस्थिति देकर शांतिपूर्वक धरना देंगे |

उक्त जानकारी हमे अन्तिम कुमार सिटोले ने दी।

Tuesday, 20 June 2017

कृषि भूमि मुवावजा एवं शराब फैक्ट्ररी को लेकर हुआ उग्र आंदोलन


सौसर, छिंदवाड़ा(म.प्र) :- ब्लॉक कांग्रेस द्वारा दिनाक आज 20 जून को सभी कांग्रेस के सभी मार्चा सगठन संगठनों के सयुक्त तत्वावधान में उग्र प्रदर्शन कर चक्का जाम किया।

गोंडिवडोना बाँधा में गई किसानों की भूमि को लेकर तहसील मुख्यालय पर विगत दिनों से कई आंदोलन का शिलशिला चल रहा था परन्तु बार बार प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा आश्वाशन देकर किसानों के साथ टाला मटोली की जा रही थी एवं बोरगांव में खुल रही गुलशन फैक्ट्ररी के विरोध में ब्लॉक कमेटी कांग्रेस के द्वारा दोपहर 12:30 बजे से तहसील कार्यालय शहीद चौक पर धरना दिया गया परन्तु धरने से समाधान नही हुआ तो दोपहर 2 बजे से चक्का जाम प्रारम्भ हुआ चक्का जाम के दौरान टायर जलाकर किसान एकता जिन्दाबाद किसानों का कर्जा माफ़ करो शिवराज सिंह मुर्दाबाद एसडीएम हटाओ सौसर बचाओ शराब फैक्ट्री का निर्माण कार्य बंद करो के नारे लगे।

इस दौरान नागपुर - छिंदवाड़ा रोड पर आवागमन बंद हो गया जिससे हाइवे की दोनों तरफ से सैकड़ों कतार में वाहनों की लम्बी कतार लग गई लगभग १ घंटा चक्का जाम चलने के पश्चात प्रशासन द्वारा अधिकृत की गई किसानों की भूमि के बैंक खातों में १ लाख रु. अतिशीघ्र डालने एवं बोरगांव में बन रही शराब फैक्ट्री के ऊपर उचित कार्यवाही का आश्वासन देने के पश्चात चक्का जाम समाप्त हुआ।

धरने एवं चक्का जाम में मुख्य रूप से किसान सहित ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष पुनाराम बाविस्टाले ,पूर्व कृषि मंडी अध्यक्ष अशोक चौधरी ,पूर्व मार्केटिंग अध्यक्ष युवराज जिचकार ,कृषि मंडी अध्यक्ष श्रीमती विमल चौधरी , ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष राजेश येमदे ,महामंत्री अनिल ठाकरे ब्लॉक एवंम कांग्रेस अध्यक्ष अतुल जुन्नाकर ,सुनील बांगे, विजय चौरे, संदीप भकने, श्रीमती राजबाई बिसेन ,रविंद्र चौरे, विजय चौधरी ,कैलाश चौधरी ,भागवत महाजन ,प्रवीण चौधरी, राजू चौधरी, विट्ठल गायकवाड़ और विलास बुले सहित कई कार्यकर्ता गण मौजूद थे इस आंदोलन में शान्ति पूर्वक सम्पन्न हुआ।
मौंके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात था फायर ब्रिगेड की गाड़ी भी खड़ी थी।

Monday, 19 June 2017

कल भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान को हरा देती तो क्या होता?

कल भारत क्रिकेट मैच जीत जाता तो महंगाई, बेरोजगारी, जातिय आतंकवाद, शहीद होते जवान और देश मे खुशहाली आ जाती?

यदि आपका जवाब नही है तो दिल पर क्यो ले रहे हो?
सट्टा या जुआ में रुपये जितने वाले थे और नही जीत पाए तो आपका दुखी होना लाज़मी है।

देश की सरकार और मीडिया राष्ट्रीय हित से जुड़े मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए स्क्रिप्ट तैयार करती है कभी गाय, कभी मंदिर, कभी तीन तलाक और पिछले एक सप्ताह से क्रिकेट का गरम मसाला मिल गया था।

सुबह शाम क्रिकेट, क्रिकेट , क्रिकेट , हवन, पूजन, मन्त्र आदि आदि।

दिल्ली में लाखों भीम सैनिको का जमावड़ा था, मध्यप्रदेश में किसान बिलख रहे है और कल छत्तीसगढ़ में किसानों ने चक्का जाम था उसे मीडिया ने तवज्जो नही दिया जानते हो क्यो?
क्योंकि उस खबर से मोदी सरकार की छवि धूमिल होती।

जागो शिक्षित हो तो जवाबदार नागरिक की तरह बर्ताव करो क्यो भावनाओं में बह रहे हो?

सरकार से सवाल करो, जवाब माँगो!
हमे न्याय चाहिए, हमे सुरक्षा चाहिए, हमे मानवीय हक चाहिए, हमे रोजगार चाहिए और देश मे मानवीय विचारधारा की नीतियों से संचालित योजनाये चाहिए।

धार्मिक मुद्दों और स्वप्नों की दुनियाँ से बाहर आइये हमे बेहतर भारत चाहिए।

आलेख:
सुरेश पासवान
महासचिव, वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी





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Friday, 9 June 2017

बिरसा मुंडा 19वीं सदी के एक प्रमुख जननायक थे लेकिन देश ने भूला दिया?

शत-शत नमन!

जन्मस्थल : खूँटी झारखंड
मृत्युस्थल: राँची झारखंड
आन्दोलन: भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम

बिरसा मुंडा 19वीं सदी के एक प्रमुख आदिवासी जननायक थे। उनके नेतृत्‍व में मुंडा आदिवासियों ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में मुंडाओं के महान आन्दोलन उलगुलान को अंजाम दिया। बिरसा को मुंडा समाज के लोग भगवान के रूप में पूजते हैं।

आरंभिक जीवन

1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजो से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग "धरती बाबा" के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी।
बिरसा मुण्डा का राँची स्थित स्टेच्यू।

1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं।

जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारियाँ भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये।
बिरसा ने अपनी अन्तिम साँसें 9 जून 1900 को राँची कारागार मे लीं। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में उन्हें सिर्फ आदिवासी,अनुसूचित जाति के लोग ही सम्मान देते है ऐसा क्यों?

इस महापुरुष को सिर्फ आदिवासियों का महापुरुष क्यों कहा जाता है?
मनुवादियों का यह कमीनापन नही है तो क्या है?




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Tuesday, 6 June 2017

मन्दसौर में पुलिस फ़ायरिंग में 4 किसानों की मौत पर बोले सिंधिया

कांग्रेस के युवा तेज तर्रार सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंगलवार को प्रदेश के मंदसौर में पुलिस की गोली लगने से आन्दोलनकारी किसानों की मौत को इसे शिवराज सरकार का कायराना कृत्य बताया है।

सिंधिया ने कहा कि शिवराज सरकार द्वारा छले गए किसानों के आन्दोलन को यदि सरकार पुलिस की गोली के दम पर निपटना चाहती है तो इस से शर्मनाक कुछ और नहीं हो सकता है।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री किसान पुत्र होने का दम्भ भरते है और उनके ही राज में यदि किसानों को पुलिस की गोली खाकर मृत्यु के मुंह में जाना पड़े तो इससे बुरा और क्या हो सकता है।

मन्दसौर में पुलिस फ़ायरिंग में 2 किसानों की मौत होना अत्यंत ही दुर्भागयपूर्ण एवं दुखद है। मैं स्तब्ध हूं। उनके परिवार के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं।

अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे अन्नदाताओं के ख़िलाफ़ सत्ता के नशे में मगरूर सरकार तानाशाही तरीक़े से उनकी आवाज को कुचलना चाहती है। मध्य प्रदेश के इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ। हमारे अनंदाताओं पर गोली चलाना बेहद दुखदायी एवं दिल को दहलाने वाला है। प्रदेश के लिए ये एक काला दिन है|

मध्य प्रदेश में किसानों के आंदोलन को जिस बर्बरता से कुचला जा रहा है, वो अत्यन्त शर्मनाक है। मैं इस दुःखद घटना की कड़ी निंदा करता हूँ।





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