Tuesday, 30 May 2017

अब एकलव्य अपनी योग्यता दुनियाँ के सामने सिद्ध कर रहा है।

फुले दम्पत्ति और बाबासाहेब अम्बेडकर का संघर्ष साबित कर रहा है ज्ञान कि ठेकेदारी किसी एक जाति या वर्ण की नही होती है इस तथ्य को फिर साबित कर दिखाया है।

धन्यवाद दो बुद्ध, फुले, साहूजी, पेरियार, बिरसा, अम्बेडकर और भारतीय संविधान को जो हर भारतीय को अपनी योग्यता सिद्ध करने का अवसर देता है अब एकलव्य अपनी योग्यता दुनियाँ के सामने सिद्ध कर रहा है।

पढ़िए पूरी खबर मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश से....
यूपीएससी, आई आई टी हो या कोई अन्य शीर्षस्थ प्रतियोगी परीक्षा हर जगह शोषित, वंचितों ने अपनी मेहनत और तीक्ष्ण बुद्धि का लोहा मनवाया है।

सीबीएसई 12वीं के परिणाम में कई विद्यार्थियों ने यह साबित कर दिखाया है। डीपीएस के अनमोल गौतम ने भी ऐसा ही कुछ कर दिखाया है। 11वीं में पढ़ाई के दौरान पिता चंद्रपाल जी की मृत्यु 8 फरवरी 2016 में आकस्मिक हो गई थी। असमय परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। आर्थिक स्थिति खराब हो गई। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होना तय थी। स्कूल से मदद मांगी तो सहयोग मिला, स्कूल फीस में माफी मिल गई तो एक समस्या हल हुई। लेकिन इसके बावजूद दिक्कतें कम नहीं थीं। हौसला बनाए रखा, परिवार की परेशानियों को भूलकर लगन से पढ़ाई में जुट गया और 85.4 फीसद नंबर बिना ट्यूशन पढ़े हासिल किये। गौरतलब हो कि अनमोल बास्केटबॉल का शानदार खिलाड़ी भी है और इंटर डीपीएस प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन कर सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।

आपको बता दे कि विवेक भारती, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी अनमोल गौतम के मामा है उन्होंने हमे इस होनहार विद्यार्थी और प्रतिभाशाली खिलाड़ी के विषय में जानकारी दी है।

हम पूरी टीम की ओर से इस होनहार छात्र अनमोल की माँ सुबोध बाला को भी बधाई देते है जिन्होंने अपने बच्चे को पिता की कमी महसूस नही होने दी।

शाबास, बधाई अनमोल...





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Friday, 26 May 2017

सहारनपुर के दौरे के बाद राष्ट्रीय युवा कवि मंजीत सिंह अवतार का भयानक कार एक्सीडेंट पर कवर स्टोरी

जैसा कि आप जानते ही है कि विगत 13 मई 2017 राष्ट्रीय युवा कवि मंजीत सिंह अवतार, मिशनरी साथी मिलेन्दर गौतम, मनोज अन्तानी और पूनम अम्बेडकर, सहारनपुर के पीडितों से मिलने गये थे पीड़ितों से मिलकर लोट रहे थे रास्ते में कार एक्सीडेन्ट हो गया था जिससे गहरी चोट आई थी जिसमे राष्ट्रीय युवा कवि मंजीत सिंह अवतार गम्भीर रूप से घायल हो गए थे.

गौरतलब हो कि उन्हें हास्पिटल से छुट्टी मिल गई है वह घर पर ही उपचार करवा रहे है.
डॉक्टर ने आराम करने और बोलने से मना किया है क्योंकि उनके चेहरे पर 32 टाँके लगे हुए है फिर भी जब मेरी उनसे बात हुई तो उन्होंने चन्द लाईने कह कर चिंतामुक्त कर दिया।

आप भी सुनिये उन्होंने क्या कहा;

"हम दीवाने भीम के है
हम को कुछ न हो सकेगा|

जोश जागा है मिशन का
वो कभी न सो सकेगा ||"

उन्होंने अपने फसेबूक पर स्वास्थ्य की जानकारी दी है!
आप सभी की दुआओ से मै अब बिल्कुल स्वस्थ हूँ.

पहले तो दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ आप सभी की दुआओं और ढेर सारे प्यार का.
जख्म भरे और अब आंखे खुल पाई है.

जितने भी मित्रगण/साथी/रिश्तेदार आदि मुझे देखने आए उनका बार-बार दिल से आभार.
आपका मित्र
मन्जीत सिंह अवतार




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Wednesday, 24 May 2017

अनुसूचित जाति के लोगों को क्या आपत्ति होनी चाहिए कि महाराणा प्रताप की जयंती 'ठाकुर' नहीं मनाएं?

अनुसूचित जाति के लोगों को क्या आपत्ति होनी चाहिए कि महाराणा प्रताप की जयंती 'ठाकुर' नहीं मनाएं?

 ठाकुरों को उनकी जयंती धूमधाम से मनानी चाहिए क्योंकि महाराणा उनकी अस्मिता के प्रतीक है. इतिहास में जब तमाम राजपूत राज मुग़लो को सरेंडर कर रहे थे तब महाराणा ने लड़ने का फैसला किया.

एक योद्धा के नाते उनका सम्मान केवल ठाकुरों को ही क्यों करना चाहिए.? जो आजादी से प्यार करने वाला समाज है उन सभी के लिए प्रताप प्रेरणास्रोत है फिर चाहे वह मुस्लिम हो या ब्राह्मण, पिछड़ा हो या अगड़ा.

 यही बात बाबासाहेब अम्बेडकर के सन्दर्भ में कही जाए तो वे देश के संविधान निर्माता और समानता की लड़ाई के चैंपियन थे. पूरा देश उनसे प्यार करता है.
आम राजपूत जिसका 'सामन्त' शोषण करते थे बाबासाहेब अम्बेडकर ने उस शोषण के विरुद्ध बिगुल बजाकर संविधान में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रस्थापित किया जो मानव समुदाय की प्रगति की सबसे बुनियादी जरूरत है.

तो भला ठाकुर समुदाय उनसे नफरत क्यों करेगा? क्या उन्हें याद नहीं कि 'सिरोही' के महाराजा ने उन्हें डेल्ही में बहुत बड़ा घर रहने को दिया था.
फिर उत्तरप्रदेश में वे कौन लोग है जो अनुसूचित जाति बनाम ठाकुरों की लड़ाई लगवाकर 'ठाकुरों' को अपना सेफ्टी वॉल्व बनाना चाहते है?

भारत बिलवाल की Fb पोस्ट से सभार




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Wednesday, 17 May 2017

काश पुराना वाला मोदी होता..

कांगेस पदाधिकारी द्वारा बीजेपी सरकार और पीएम मोदी की जमकर आलोचना की गई है आप भी पढ़िए!

1- एक था मोदी जो सरहद पर होते हर हमले पर कहता था कि समस्या सरहद पर नहीं, दिल्ली में बैठी सरकार में है।
तथ्य: अब समस्या सरहद और सरहद के पार है।
2- एक था मोदी जो कहता था कि सरकार को लव लेटर लिखना बंद करना चाहिये, आंख में आंख डाल कर पाकिस्तान और चीन से बात करनी चाहिये।
तथ्य: तीन साल में पांच सौ के लगभग सैनिक मारे जा चुके, चीन दर्जनों बार घुसपैठ कर चुका, अपने नक्शे में सीमावर्ती इलाकों के नाम तक बदल डाले... पर सरकार सिर्फ निंदा से काम चला रही है।

3- एक था मोदी जो कहता था देश में किसानों की बेहतर स्थिति के लिये रियल टाईम डाटा कलेक्ट करके उन्हें आधुनिक और समर्थ बनाया जाये।
तथ्य: तीन साल में कई सौ किसानों ने खुदकशी की, कर्ज और भुखमरी से परेशान हो कर।
4 एक था मोदी जो मनमोहन सिंह के दिये आधार का मजाक उड़ाता था।
तथ्य: आज सरकार ने हर योजना के लिये आधार जरूरी कर दिया।
5 एक था मोदी जो मनरेगा को विफलताओं की स्मारक, GST को घातक और एफडीआई को देश विरोधी बताता था।
तथ्य: आज मनरेगा में पहले से ज्यादा पैसा, एफडीआई देश हित में और GST के सारे पाप धुल गये बताये जा रहे हैं।
6 एक था मोदी जो चाय पर चर्चा में लोगों को बताता था कि देश के बाहर इतना काला धन है कि वह आ जाये तो हर एक के खाते में 15-15 लाख आ जायें।
तथ्य: सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद उन काले धन वालों के नाम तक सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जिनकी सूचि सरकार के पास मौजूद है।

7 एक था मोदी जो माँ बेटे की सरकार को जम कर कोसता था कि उसकी सरकार आते ही सारे भ्रष्टाचारी कांग्रेसी जेल में होंगे।
तथ्य: तीन साल में एक कांग्रेसी का कुत्ता तक भी जेल न भेजा जा सका, उल्टे सारे भ्रष्टाचारी अपनी पार्टी में ले के पवित्र घोषित कर दिये।
8 एक था मोदी जो मंहगाई को माँ बेटे की सरकार की देन बताता था और चेले चपाटे मोदी सरकार आते ही डालर 32 रुपये का कर रहे थे।
तथ्य: डालर तो छोड़िये, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें औंधे मुंह गिरने के बाद भी भारत में 70 रुपये तक बिक रहा, जरूरी सब्जियों और दालों के दाम सौ से दो सौ तक पंहुच रहे... सर्विस टैक्स में बढ़ोतरी और सेंस की वजह से हर सामान मंहगा, बीमा मंहगा हो गया मगर अब इसे विकास बताया जा रहा है।
9 एक था मोदी जो भरोसा दिलाता था कि उसके आते ही आतंकवाद दम तोड़ देगा।
तथ्य: दिनों दिन आतंकी घटनाओं में वृद्धि होती जा रही, सालों से शांत पड़ा कश्मीर सुलग रहा है लेकिन इसे ऑल इज वेल कीi श्रेणी में रख दिया गया गया है।
कितनी कस के आंखें बंद किये हो भाई कि इनमें से कुछ दिख ही नहीं रहा... अब तो जागो।_
यह 56" वाला तो महा कायर निकला!

जागरूकता अभियान
विजय सिंह भेरूखेड़ा(पूर्व सरपँच)
सचिव ,मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी आई टी सेल भोपाल
महामंत्री व प्रवक्ता
ब्लाक कांग्रेस कमेटी उज्जैन दछिण

Tuesday, 16 May 2017

हमारा भी समर्थन भीम आर्मी को लेकिन शर्तो के साथ

दोस्तो आप सभी को क्रांतिकारी जय भीम - वी लव बाबासाहेब!
आज हमें और #भीम_आर्मी को निर्णय लेना होगा कि हम #जातिवादी_आतंकवाद से कैसे निपटें?
कब तक खून बहेगा?
कब तक मंदिर जाने पर अपमानित होते रहे?
कब तक माँ-बहनो की आबरू लूटी जायेगी?
कब तक छुआ छूत जैसे अमानवीय अत्याचारो को सहेंगे?
इन प्रश्नों का क्या यही जवाब है कि हम भी खून बहाये, हम भी हिंसा करें?
हम भी उन्ही की तरह क्रूरतम अपराध करे?

हमारा मानना है कि हम उस व्यवस्था को ही त्याग दे जिस कारण हमें शुद्र, नीच, दलित कहा जाता है स्पष्ट रूप से कहे तो हमे जातिविहीन समाज की स्थापना करना होगा और यह जाति पर अभिमान से सम्भव नही है.

हमे 14 अक्टूबर 1956 में बाबासाहेब अम्बेडकर ने जो बौद्ध धम्म में पुनः वापसी की थी 8 लाख अनुयायियों के साथ और जो 22 प्रतिज्ञाएँ दी थी उस पर विचार करना होगा.
आखिर बाबासाहेब अम्बेडकर ने बौद्ध धम्म में अपने अनुयायियों को वापसी क्यो करवाई थी?
आप सरकार से न्याय के लिए प्रदर्शन करोगे, न्याय की गुहार लगाओगे क्या यह मनुवादी सरकार न्याय देगी?
दोषियो को सजा मिले इसके लिए अभियान तो चलते रहना चाहिए किन्तु प्रबुद्ध भारत अभियान का बड़े पैमाने में भी अभियान चले क्योकि जबतक हम स्वंय की जाति में बंधे रहेंगे तब तक यह पुष्यमित्र शुंग और पेशवाओ को आदर्श मानने वाले हमे नीच और शूद्र समझते रहेंगे इसलिए त्याग दो उस बेड़ी को जो तुम्हे समानता नही देती.

एक बात और है सिर्फ धर्म परिवर्तन से ही यह भेदभाव खत्म नही होगा हमे धर्म परिवर्तन के बाद जाति मुक्त समझना होगा.
हम सिर्फ एक मनुष्य और भारतीय है यह विचार को कठोरता से मानना होगा.
ब्राह्मणवादी हर रीतिरिवाजों का त्याग करना होगा बुद्ध और बाबासाहेब अम्बेडकर के वैचारिक दृष्टिकोण को अध्ययन करके आत्मसात स्वंय को तो करना होगा बल्कि जिन्हें हम हमारे मूल धम्म में वापस लाये है उन्हें भी बुद्ध और उनका धम्म से रूबरू करवाना होगा.

क्योंकि जो लोग धर्म परिवर्तन कर बौद्ध बने हैं, उनकी यह सबसे बड़ी समस्या है कि उनका समूचा आचरण, समूचा व्यवहार अपनी जाति के अंतर्गत ही चलता है और बाहर जो विशाल दुनिया है, उस विशाल दुनिया की तरफ देखने का जो दृष्टिकोण है, तथागत बुद्ध का विचार स्वीकृत करने के बावजूद भी उनका दृष्टिकोण विकसित नहीं हो पाया है.  हम देखते हैं कि लोगों ने धर्म परिवर्तन तो किया मगर उनके विचारों में किसी किस्म का कोई परिवर्तन होता हुआ नजर नहीं आता। कम से कम जिस मकसद को लेकर बाबासाहब अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन किया, उस मकसद, उस उद्देश्य के अनुरुप लोगों के विचारों में परिवर्तन नहीं हो पाया है.

इसलिए हमें यह याद रखना होगा कि
हम भूल जाये कि हम कभी हिन्दू थे हम कभी भी हुन्दू नही थे हमारे पूर्वज सम्राट अशोक के शासनकाल में बौद्ध अनुयायी थे किंतु प्रतिक्रांति के कारण हमें पुनः गुलाम बनाया गया और तुच्छ कार्यो को करने पर मजबूर किया गया था.

भीम आर्मी और गुजरात के जिग्नेश मेवानी जी के सभी साथियो से वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी की पूरी टीम की अपील है कि हम बाबासाहेब अम्बेडकर के दिखाए रास्ते पर चले हमे कोई नया कांसेप्ट बनाने की आवश्यकता नही है बुद्ध और बाबासाहेब अम्बेडकर की विचारधारा उनका कॉन्सेप्ट पर्याप्त केवल हमे उसे समझ कर एक बार इस अभियान को गति दे अभी अच्छा समय है आप सभी आंदोलित है तो आइए हम सभी मिलकर धम्म क्रांति के आंदोलन में अपनी ताकत लगाए.
हम समाजिक क्रांति के पहिये को गति प्रदान करे सम्पूर्ण क्रांति अवश्य होगी.

हम अपने साथियों से अपील करते है संवैधानिक दायरे में रहते हुए आंदोलन करे क्योकि हमे इस सरकार पर अब भरोषा नही रहा यह हमारी कमजोरियों को पकड़ कर हमे ब्लेकमेलिंग करेगी.
हम अपनी ताकत पहचाने हमारी ताकत भारतीय संविधान है.

सुरेश पासवान, राष्ट्रीय महासचिव
राकेश महाले, प्रदेश अध्यक्ष (म.प्र)
वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी, भारत





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Sunday, 14 May 2017

आदिवासी चाकमा बौद्धों के साथ अरुणाचल प्रदेश में अन्याय

कृपया पूरी रिपोर्ट देखिये नजर अंदाज न करें , प्रत्येक को अरुणाचल प्रदेश के चाकमा बौद्धों के बारे में जानना चाहिए.


प्रशासन व वन विभाग द्वारा आदिवासी चकमा बौद्धों के घरों को ०८ मई २०१७ को तोड़ा गया और उन्हें जलाया गया. असहाय चकमा लोगों के घरों को JCB की सहायता से CRPF द्वारा अरुणाचल प्रदेश के प्रशासन व वन विभाग ने कैसे तोडा तथा जलाया है?

यह अरुणाचल प्रदेश के चेंग्लांग जिले के दियून सर्कल के अंतर्गत आने वाले राजनगर तथा ज्योत्सनापुर गाँवो के बीच पुनर्वासित बाढ़ पीड़ितों को वन विभाग तथा स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत द्वारा “भगाओ अभियान” है.

प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगों के राहत के लिए केंद्र तथा राज्य सरकार के कुछ नियम कानून हैं किन्तु राज्य सरकार ने बाढ़ आपदा से प्रभावित असहाय चकमा आदिवासी लोगों के लिए कोई अन्य विकल्प मुहैया कराये बिना यह अमानवीय निर्णय लिया है.

इस संबंध में बाढ़ प्रभावितों द्वारा उच्च न्यायालय की ईटानगर बेंच में मामला फ़ाइल किया गया है. मामला अभी विचाराधीन है. अरुणाचल प्रदेश चकमा छात्र संघ (APCSU) ने भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) नयी दिल्ली में भी शिकायत दर्ज की है.

दरअसल मामला यह है कि इस बरसात में बाढ़ से २०० से अधिक चकमा लोग प्रभावित हुए. उन्हें अपनी संपत्ति समेत जमीन को खोना पड़ा. अब उनके पास न रहने को घर है न खाने को भोजन. इस प्राकृतिक आपदा के बाद इन २०० परिवारों को वन विभाग से अस्थायी आवास के लिए अनुमति मिली थी किन्तु गंदी राजनीति के कारण स्थानीय प्रशासन और वन विभाग द्वारा यह अमानवीय निर्णय आदिवासी चकमा बौद्धों के विरुद्ध लिया जा रहा है.

पीड़ितों ने कहा कि ;हमारे सामने चिंता का पहाड़ खड़ा हो गया है . मसलन अब हम कहाँ रहें और कहाँ जाएँ ? बिना घर और आय के हम कैसे जीवित रहेंगे ? मानवअधिकार कहाँ हैं ? न्याय कहाँ है ?

अरुणाचल प्रदेश सरकार हमारे अधिकारों से खेल रही है. हम पिछले पचास सालों से इस राजनीति के शिकार हैं. सक्षम डिग्रीधारी होने के बावजूद हमें सरकारी नौकरियां नहीं दी जाती. हमारी प्रतिभा की अरुणाचल प्रदेश में कोई कीमत नहीं है .

ऑल इंडिया चकमा सोशल फोरम  ने कहा कि समुदाय को पिछली करीब आधी सदी से नागरिकता के अधिकारों से वंचित रखा गया है और वह इसे लेकर हस्तक्षेप करें.
 उन्होंने बताया कि 1964-68 के दौरान करीब 15,000 चकमा तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के चटगांव पर्वतीय क्षेत्रों से भाग आए थे.

भारत आने के बाद वे तत्कालीन नॉर्थईस्टर्न फ्रंट एजेंसी :नेफा: में बस गए, जो इस समय अरूणाचल प्रदेश है.
उन्होंने ने दावा किया कि तब से उच्चतम न्यायालय के विशिष्ट निर्देशों के बावजूद अरूणाचल प्रदेश में रहने वाले एक भी चकमा प्रवासी को नागरिकता अधिकार नहीं दिए गए.

बाद में एक दूसरी रिट याचिका के बाद उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में भारतीय संघ और अरूणाचल प्रदेश सरकार को नागरिकता के आवेदनों पर ध्यान देने का निर्देश दिया.

आरोप लगाया गया कि नागरिकता के मानदंड पूरे करने के बावजूद नागरिकता देने के लिए किसी भी चकमा प्रवासी के आवेदन की सिफारिश नहीं की गयी.

इस कारण हम पूरे भारत में कहीं भी सरकारी नौकरी के पात्र नहीं रह जाते. इसी कारण बहुत से चकमा बच्चे ज्यादा पढ़ना नहीं चाहते. गरीब होने के कारण माँ-बाप भी शिक्षा पर खर्च नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि पढ़े-लिखे डिग्रीधारी होने के बावजूद इन्हें नौकरियां नहीं मिलने वाली है . हमारे क्षेत्र के स्कूलों की अवस्था भी खस्ता है. सारा फंड अधिकारी खा जाते हैं परिणामस्वरुप स्कूल की अवस्था ख़राब ही रहती है .

हमारी आवाज उठाने वाला हमारा कोई प्रतिनिधि भी अरुणाचल प्रदेश में नहीं है क्योंकि केवल 5% चकमा ही वोटर्स हैं जबकि ९५ % चकमा वोट नहीं दे सकते हैं. दुःख से कहना पड़ता है कि लोकतंत्र के सर्वोत्तम व आवश्यक वोटिंग के अधिकार को हमसे छीना जा रहा है .

हमारे समाज में कोई इतना पढ़ा-लिखा नहीं है जो हमारी लड़ाई लड़ पाए. इसीलिए अरुणाचल प्रदेश के लोग इसका नाजायज फायदा उठाते हैं. अतुल पी चकमा ने बताया कि मैं अपने बचपन के दिनों से देख रहा हूँ कि बहुत सारे भोले चकमा लोगों को मार डाला गया , उनके घर जला दिए गए . प्रशासन से किसी को न्याय नहीं मिला. यहाँ तक कि पुलिस भी हमारी रपट नहीं लिखती है. हमारी जिंदगी या मौत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती. जबसे थोड़े बहुत चकमा पढ़-लिख गए हैं और समाज के लिए लड़ने को तैयार हो रहे हैं तो अभी थोड़ी-बहुत परिस्थितियां बदल रही हैं.

8 मई 2017 की घटना ने भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त हमारे मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है. यह घोर अन्याय है. हमारे लोकतांत्रिक देश पर शर्मनाक धब्बा है. इस तरह की घटना की हमने अरुणाचल प्रदेश सरकार से जरा भी अपेक्षा नहीं थी. इस तरह बिना कोर्ट की नोटिस के वे हमारे घरों को तोड़ या जला कैसे सकते हैं जबकि मामला मानवधिकार आयोग तथा उच्च न्यायालय में विचाराधीन हो? मीडिया हमारी ख़राब अवस्था को दिखाता नहीं है .

हालाँकि हमने अभी तक न्याय की आशा तथा अच्छे भविष्य की संभावना छोड़ी नहीं है . हम अब भी कानून व्यवस्था का पालन कर रहे हैं . हम कोशिश कर रहे हैं कि संविधान के अनुसार हमारे अधिकार हमें मिल जाएँ. सबके प्रति हमारे मन में सम्मान है .

हम नहीं जानते कि किससे न्याय की आशा रखें? जिन्दा रहने के लिए कहाँ जाएँ ? हमारे बुरी अवस्था पर संसद में कोई क्यों चर्चा नहीं करता ?

हमारे चकमा लोगों की दुर्दशा कभी चैन से सोने नहीं देती है. भविष्य का डर सताता है . हम बिना अधिकारों के कैसे जी पाएंगे ?

भारतीय मानव अधिकार आयोग ही नहीं बल्कि अन्तराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी इस मामले में हस्तक्षेप जरूर करना चाहिए . मीडिया के अभाव में हमारी ख़राब अवस्था को कोई नहीं जान पाता.

क्या आप हमारे जीवन व मौत के इस मुद्दे को राष्ट्रीय व् अन्तराष्ट्रीय पटल पर उठाने में सहायता करेंगे?

यह हृदय विदारक मानवीय प्रश्न अरुणाचल प्रेदेश के पीड़ित चकमा जो मूलतः बौद्ध है और आदिवासी भी है उन्होंने किया? WLBS इस मुद्दे को सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय पटल पर पहुंचाने के लिए अब संकल्पित है.
इस विषय की सम्पूर्ण जानकारी हमे अतुल पी चकमा द्वारा प्राप्त हुई.





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