Saturday, 12 November 2016

भीमराज की एक बेटी ने ज़िले और प्रदेश का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है।

बैतूल,म.प्र : रानीपुर की निवासी जावलकर परिवार की बेटी मुस्कान ने सिर्फ 12 साल की नन्ही सी उम्र में देश को एक ऐसा आइडिया, तरक़ीब दिया है, जिसके कारण पूरा प्रदेश गर्व कर रहा है.

होशंगाबाद में ज्ञानोदय आवासीय विद्यालय में सातवीं कक्षा की छात्रा मुस्कान जावलकर ने रिवाल्विंग कूलर बनाने का आइडिया प्रस्तुत किया है. जिसके लिए उन्हें 7 नवंबर को महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम इग्नाइट पुरुस्कार से सम्मानित हुई.

गौरतलब हो कि मुस्कान देश भर से चयनित 31 प्रतिभागियों में से एक है, जबकि मध्यप्रदेश से अकेले मुस्कान जावलकर का इस अवॉर्ड के लिए चयन हुआ. मुस्कान की इस कामयाबी पर उनके परिवार समेत शिक्षक, दोस्त, रिस्तेदारो ने बधाई, मंगलकामनाएँ प्रेषित की है.

भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता का अधिकारो की वजह से शोषित कहे जाने वाला वर्ग आज हर क्षेत्र में अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ रहा है.

मुस्कान का परिवार बाबासाहेब डॉ. बी.आर.अम्बेडकर को अपना आदर्श मानता है इसलिए वी लव बाबासाहेब की पूरी टीम ने मुस्कान को भीमराज की बेटी कह कर बधाई प्रेषित कर रही है. लिंग भेद करने वालो के लिए यह एक बहुत ही गौरवशाली उदाहरण है की बेटी हो या बेटा यदि उसे अच्छे संस्कार दिए जाए, प्रोत्साहित किया जाये तो वह हर लक्ष्य हासिल कर सकते है.








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Thursday, 10 November 2016

बौद्ध संस्कृति पिचकी हुई है और मूल निवासियों का इतिहास बीच - बीच में उखड़ा हुआ है...

इतिहास का मुआयना
भूमिका:
वास्तविकता का इतिहास और इतिहासकारों के उपलब्ध इतिहास में फर्क होता है । इतिहास - लेखन में इतिहासकार कुछ छोड़ते हैं , कुछ जोड़ते हैं और कुछ का चयन करते हैं और फिर इसे ही किसी देश के इतिहास की संज्ञा प्रदान कर दिया करते हैं । ऐसा इतिहास वस्तुतः राजनीतिक शक्ति मात्र का इतिहास होता है जो भारी पैमाने पर हुई हत्याओं तथा अपराधों के इतिहास से भिन्न नहीं है । चिनुआ अचीबी ने लिखा है कि जब तक हिरन अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे , तब तक हिरनों के इतिहास में शिकारियों की शौर्य - गाथाएँ गाई जाती रहेंगी ।इसीलिए भारत के इतिहास में वैदिक संस्कृति उभरी हुई है , बौद्ध संस्कृति पिचकी हुई है और मूल निवासियों का इतिहास बीच - बीच में उखड़ा हुआ है ।
समय - समय पर इतिहास से संबंधित टिप्पणियों का संग्रह है - " इतिहास का मुआयना  "। विशेषकर , भाषा की आँखों से देखा इतिहास ! इतिहास में " श्री " का क्रेज गुप्त काल में था । गुप्तकालीन राजाओं ने अपने नामों से पहले सम्मानसूचक " श्री " जोड़ा है । गवाह है - प्रयाग प्रशस्ति ।उसके पहले इतिहास में " श्री " का ऐसा क्रेज नहीं मिलता है । ऐसे में " श्रीमद्भागवत " का रचना - काल गुप्तयुग हो सकता है ।
पालि में ताँबे का एक अर्थ " लोहा " है । इसका क्या मतलब ? इसका मतलब यह है कि जब लोहे की खोज नहीं हुई थी , तब लोग ताँबे को ही लोहा कहा करते थे । लोहा से लोहित शब्द बना है ,  लहू भी । लोहित का अर्थ है - लाल रंग का । मगर लोहा तो काला होता है ।  वह लाल नहीं होता है । लाल रंग का ताँबा होता है । खून के रंग का ताँबा होता है ।इसलिए आप निष्कर्ष दे सकते हैं कि पालि तब की है , जब लोहे की खोज नहीं हुई थी । तभी तो पालि में ताँबे का एक अर्थ " लोहा " भी अवशेष के रूप में मौजूद है ।
इधर बीच मैंने स्वपन कुमार बिस्वास का इतिहास - ग्रंथ " बौद्ध धर्म : मोहनजोदड़ो हड़प्पा नगरों का धर्म " पढ़ा । कोई 400 पन्नों की यह पुस्तक कई साहित्यिक और पुरातात्विक सबूतों के साथ इस बात के पक्ष में लिखी गई है कि सिंधु घाटी की सभ्यता वास्तव में बौद्ध सभ्यता थी ।पुस्तक में विस्तार से बताया गया है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा नगरों में बौद्ध स्तूप मिले हैं । ये बौद्ध स्तूप हड़प्पा कालीन हैं । हड़प्पा - मोहनजोदड़ो के स्तूपों में लगी हुई ईंटें , निर्माण की शैली , स्तूप में मिले बर्तन और बर्तन पर की गई चित्रकारी तक सभी कुछ हड़प्पा युगीन हैं । हड़प्पायुगीन इसलिए भी कि बौद्ध स्तूपों के नीचे कोई अन्य आधारभूत संरचना भी नहीं मिली है कि यह कहा जाए कि इनका निर्माण बाद में हुआ है ।ऐसे तो यह सर्वविदित तथ्य है कि सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई में स्तूप नहीं बल्कि स्तूपों की खुदाई में ही सिंधु घाटी की सभ्यता मिली है ।
अभिलेखीय साक्ष्य पुख्ता सबूत देता है कि गौतम बुद्ध से पहले भी और बुद्ध हुए हैं । आप सम्राट अशोक के निग्लीवा अभिलेख को पढ़ लीजिए , जिसमें लिखा है कि अपने अभिषेक के 14 वर्ष में अशोक ने निग्लीवा में जाकर कनकमुनि बुद्ध के स्तूप के आकार को द्विगुणित करवाया था । कनकमुनि बुद्ध ( कोनागमन ) का स्तूप सम्राट अशोक के काल से पहले बना था । गौतम बुद्ध से कनकमुनि बुद्ध अलग थे और पहले थे ।इतिहासकार के सी श्रीवास्तव ने " प्राचीन भारत का इतिहास और संस्कृति " में लिखा है कि भरहुत लेखों तथा पालि साहित्य में शाक्यमुनि के अतिरिक्त अन्य बुद्धों का भी उल्लेख मिलता है । यदि फाहियान पर यकीन करें तो उसने भी कस्सप बुद्ध और क्रकुच्छंद बुद्ध के स्मृति - स्थल देखे थे । यदि कई बुद्ध के होने की बात झूठ है तो फिर अशोक के अभिलेख सच कैसे हैं ? फाहियान का वृत्तांत सच कैसे है ? भरहुत के लेख सच कैसे है ? और जब सब कुछ झूठ ही है तो फिर आपका इतिहास सच कैसे है ?
" इतिहास का मुआयना " इतिहास में दबे कई गुमनाम पन्नों को खोलने के प्रयास में लिखा गया है । पुस्तक में इतिहास का क्रमबद्ध पुनर्लेखन नहीं है , मगर जगह - जगह पर सवालिया निशान लगाए गए हैं । इतिहास - लेखन सतत प्रक्रिया है । ऐसे में संभावना है कि पुस्तक से भविष्य में इतिहास - लेखन के कुछ सूत्र मिल सकें ।

डॉ राजेन्द्रप्रसाद सिंह
(लेखक प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक हैं। यह लेख उनकी fb पोस्ट से साभार लिया गया है।)
गाँधीनगर , सासाराम, बिहार



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Tuesday, 8 November 2016

छिंदवाड़ा: कर्मठ, जुझारू युवा कार्तिक डोले, वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी छिंदवाड़ा(म.प्र) इकाई के जिला उपाध्यक्ष नियुक्ति


यह नियुक्ति नीरज अहिरवार जिलाध्यक्ष ने प्रदेश अध्यक्ष अधिवक्ता राकेश महाले की अनुमति से की है।

इस नियुक्ति पर शिवा मण्डराह, जीपी सूर्यवंशी (प्रदेश महासचिव), कृष्णकांत चौरासे, प्रदेश प्रवक्ता, अक्षय डोले आदि युवाओं ने बधाई सन्देश प्रेषित की है।

गौरतलब हो की कार्तिक डोले द्वारा गरीब बच्चों को निशुल्क कोचिंग प्रारम्भ करने की घोषणा की है उन्होंने कहा की शिक्षा द्वारा बाबासाहेब अम्बेडकर एंव अन्य सभी महापुरुषों के दिखाएँ गए मार्ग पर चलकर प्रबुद्ध भारत निर्माण किया जा सकता है।

इस नियुक्ति की सुचना देते वक्त नीरज अहिरवार जिलाध्यक्ष #welovebabasaheb ने कहा की जिले के अम्बेडकरवादी युवाओ को संगठित करके जिला कार्यकारणी का गठन शीघ्र ही किया जायेगा।



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Tuesday, 1 November 2016

हमारे गौरवशाली इतिहास को अब छुपाया नही जा सकता है-पासवान

हमारा सच्चा गौरवशाली इतिहास छुपाया गया है इतिहासकारो ने इतिहास लिखते वक्त जातिवाद, भेदभाव बरता आज़ादी की लड़ाई की शुरुआत 1857 में मंगल पण्डे का नाम लेकर ढंके बजाये जाते है किन्तु गौरतलब हो की मंगल पण्डे को अंग्रेजो से विद्रोह, बगावत करने की प्रेरणा मातादीन वाल्मीकि से मिली वरना पण्डे जी जीवन भर अंग्रेजो की नौकरी ही करते रहते, मातादीन वाल्मीकि को अछूत होने के नाते भुला दिया गया।
दरअसल 1857 के "सिपाही विद्रोह" जिसके नायक के रूप में मंगल पांडे को माना जाता है, वह अंग्रेजी सेना के सिपाही थे। मातादीन छावनी की कारतूस फैक्ट्री में सफाई कर्मचारी थे। एक दिन मातादीन ने मंगल पांडे से पानी पीने के लिए लोटा मांगा तो मंगल पांडे ने साथ काम कर रहे अछूत सिपाही को लोटा देने से मना कर दिया। तब अपमानित मातादीन ने फटकारते हुए कहा,  बड़ा आया है ब्राह्मण का बेटा.... जिन कारतूसों का तुम उपयोग करते हो उन पर गाय और सूअर की चर्बी लगी होती है, जिसे तुम अपने दांतों से तोड़ कर बंदूक में भरते हो क्या उस समय तुम्हारा धर्म भ्रष्ट नहीं होता? इस तंज का मंगल पांडे के दिमाग पर गहरा असर पड़ा अंग्रेजों की इस करतूत को मंगल पांडे ने हिन्दू और मुस्लिम सिपाहियों की बैठक में बड़ी गंभीरता के साथ रखा मातादीन के इसी तंज ने सिपाहियों को जगा दिया।  सैनिकों ने कारतूस को दांत से खींचने से मना कर दिया अंग्रेज इस बात से बौखला गए, जिससे अनु. जाति मातादीन और मंगल पांडे को पकड़ कर फांसी दे दी गई. इससे बढ़कर विडंबना और क्या हो सकती है कि इतिहास में मंगल पांडे का नाम शहीदों में सबसे ऊपर है लेकिन आजादी का मंत्र फूंकने वाले मातादीन भंगी को भारतीय इतिहास में कहीं स्थान नहीं मिल सका?
जबकि आज़ादी की प्रथम लड़ाई 1857 में मंगल पण्डे द्वारा नहीं लड़ी गई थी, बल्कि जंगे आजादी की लड़ाई 1804 में ही शुरू हो गई थी। और यह लड़ाई लड़ी गई थी छतरी के नबाब द्वारा छतरी के नबाब का अंग्रेजो से लड़ने वाला परम वीर योद्धा था ऊदैया, जिसने सैकड़ो अंग्रेजो को मौत के घाट उतार दिया था। उदैया की वीरता के चर्चे अलीगढ के आस पास के क्षेत्रो में आज भी सुनाई देते हैं,उनको 1807 में अंग्रेजो द्वारा फाँसी दे दी गई थी 
इसी श्रेणी में बांके का नाम आता है, बांके जौनपुर जिले के मछली तहसील के गाँव कुवरपुर के निवासी थे , उनकी अंग्रेजो में इतनी दहशत थी की सन्1857 के समय उनके ऊपर 50 हजार का इनाम रखा था अंग्रेजो ने जरा सोचिये जब 2 पैसे की इतनी कीमत थी की उस से बैल, गाय ख़रीदा जा सकता था तो उस समय 50 हजार रूपये का इनाम कितना बड़ा होगा?
वीरांगना झलकारी बाई को कौन नहीं जानता? रानी झाँसी से बढ़ के हिम्मत और साहस की चर्चा सभी करते है किन्तु झलकारी बाई को भुला दिया गया कारण वह अनुसूचित जाति की उपजाति कोरी जति से थी।पर अछूत होने की वजह से उनको पीछे धकेल दिया गया और रानी झाँसी का गुणगान किया गया ।
इसके आलावा कुछ और अनुसूचित जाति, जनजाति के क्रान्तिकारियो के नाम जो गोरखपुर, उत्तरप्रदेश के अभिलेखों में दर्ज हैं।
आज़ादी की लड़ाई में चौरा- चौरी काण्ड एक मील का पत्थर है , इसी चौरा- चौरी कांड के नायक थे  रमापति, इन्ही के नेतृत्व में हजारो अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ावर्ग की भीड़ ने चौरा-चौरी थाने में आग लगा दी थी जिससे 23अंग्रेज सिपाहियो की जलने से मौत हो गई थी। प्रसिद्द इतिहासकार डी. सी. दिनकर ने अपनी पुस्तक ' स्वतंत्रता संग्राम में अछूतो का योगदान' में उल्लेख किया है कि - अंग्रेजो ने इस काण्ड में सैकड़ो को गिरफ्तार किया 228 अछूतों पर सेशन सुपुर्द कर अभियोग चला। निचली अदालत ने 172 अनुसूचित जाति, जनजाति के वीरो को फांसी की सजा सुनाई। इस निर्णय की ऊपरी अदालत में अपील की गई , ऊपरी अदालत ने 19 को फाँसी, 14 को आजीवन कारवास , शेष को आठ से पांच वर्ष की जेल हुई।
2 जुलाई 1923 को 18 अन्य दलितों के साथ चौरा- चौरी कांड के नायक रमापति को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।
इसके आलावा 1942 के भारत छोडो आंदोलन में  मारने वाले और भाग लेने वाले कथित अछूतों की संख्या हजारो में हैं
ऊधम सिंह की वीरता क्यों छुपाई गई यह प्रश्न भी बहुत ही महत्वपूर्ण है जलियावाला बाग़ का बदला लेने वाले और लन्दन जाके माइकल आडेवयार को गोलियों से भून देने वाले अनुसूचित जाति के शहीद ऊधम सिंह जिसका नाम सुनते ही अंग्रेजो के होश उड़ जाते थे आज उन्हें भी इतिहासकारो ने छुपाया।
वी. आर. बौद्ध सैलानी - प्रदेश उपाध्यक्ष
रामनाथ - प्रदेश महासचिव
किन्तु सच्चाई तो सच्चाई होती है अब वक्त है की हम नौजवान शिक्षित वर्ग अपना इतिहास पुनः लिखे और स्वंय में हीनता के भाव खत्म करे यह कार्य हम अब सोशल मीडिया के माध्यम से बेहतर ढंग कर सकते है जरूत पड़ने पर धरातल पर भी उतरा जायेगा यह वक्तव्य सुरेश पासवान, राष्ट्रीय महासचिव वी लव बाबासाहेब सोशल सोसाइटी(रजि.) ने व्यक्त किए।
उन्होंने बताया कि देश भर के युवाओ को संगठित किया जा रहा है इसी श्रृंखला में गिरिराज वेद, प्रदेश अध्यक्ष, राजस्थान ने अधिवक्ता माला दास, राष्ट्रीय अध्यक्ष एंव विवेक भारती, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष से चर्चा करके राजस्थान के जुझारू युवाओ की टीम की पहली सूचि घोषित कर दी है।
राजस्थान के जुझारू, कर्मठ, सक्रिय अम्बेडकरवादियो सूची:
1. वी. आर. बौद्ध सैलानी - प्रदेश उपाध्यक्ष
2. रामनाथ - प्रदेश महासचिव
जिलाध्यक्षो की प्रथम सूची:
1. आर. के. मेघवाल - जालौर
2. बलवंत मेघवाल - सिरोही
3. बरहम देव बैरवा - दौसा
4. विजेंद्र कुमार बलाई - जयपुर
5. पृथ्वीराज बैरवा - करौली
6. बी. एक. पारस - श्री गंगानग




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