राकेश महाले, प्रदेश अध्यक्ष(म .प्र), वी लव बाबा साहेब सोशल सोसायटी ने आज क्रांतिकारी अम्बेडकरवादियो की टीम में #राहुल_वाल्मीकि को प्रदेश का सचिव एंव #सम्यक_अंकुर को बालाघाट का जिला अध्यक्ष नियुक्त किया है.
राकेश महाले ने बताया की टीम में क्रांतिकारी अम्बेडकरवादी, शिक्षित, युवाओ को मौका दिया जा रहा है ताकि वे सोशल मिडिया के माध्यम से हमारे महापुरुषो के मानवतावादी विचारो से समाजिक क्रांति के आंदोलन को तेज गति प्रदान कर सके.
गौरतलब हो कि वर्तमान में सोशल मिडिया ही सच्ची मीडिया का एक पर्याय साबित हो रहा है इसके माध्यम से देश के लाखो अम्बेडकरवादी बेधड़क लिख रहे है।
वी लव बाबा साहेब सोशल सोसायटी पंजीकृत संगठन है जो सोशल मिडिया में अम्बेडकरवाद की पहचान बन चूका है। फेसबुक पेज पर ५३००० फोल्लोवेर्स जुड़े है ४ लाख से अधिक लोग इसके पोस्ट पढ़ रहे है.
twitter, YouTube, WhatsApp में भी सक्रियता है इस लोकप्रियता से उत्साहित हो कर अब यह संगठन धरातल पर उतर गया है. राकेश महाले ओजस्वी वक्ता है वे आन्दोलनकारी नेता के रूप में जाने जाते है दूसरी ओर शौर्य गौतम केडर कैम्प का मोर्चा सम्हाल रहे है. अन्य पदाधिकारी भी अपनी कार्यशैली से मनुवाद की खाल उधेड़ रहे है.
राहुल वाल्मीकि एंव सम्यक अंकुर ने इस अवसर पर प्रदेश अध्यक्ष एंव अन्य पदाधिकारियों को धन्यवाद प्रेषित किया और विश्वास दिलाया की वे संगठन के लिए ईमानदारी और महापुरुषों की विचारधारा अनुरूप कार्य करेंगे.
सभी पदाधिकारियों ने नव नियुक्त साथियो को बधाई एंव मंगलकामनाएँ दी है.
जैसा कि आप जानते है की हमे संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है किन्तु राजनैतिक, धार्मिक नेताओ द्वारा झूठे आरोप लगा कर निर्दोष लोगो को क़ानूनी अड़ंगे में उलझाया जा रहा है।
आरक्षण विरोधी, जाति सूचक शब्दों से खुलेआम सोशल साइट्स, सार्वजनिक स्थलो से अशोभनीय टिप्पणियाँ और भद्दी-भद्दी गालियाँ देते है उन्हें पुलिस या कानून का कोई भय नही रहता है।
यही हाल राजनेताओ, धर्म गुरुओ का भी है वे प्रेस वार्ताओं, सार्वजनिक मंचो के माध्यम से संविधान, आरक्षण की कटु निम्नस्तरीय निंदा करते है साथ ही भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को अपमानित भी करते है तब पुलिस विभाग, न्यायालय भी संज्ञान नही लेता है।
कोई कुत्ते का बच्चा, कौआ, गधा, शुद्र कहकर औकात की संज्ञा देता है कोई धर्म शास्त्रो सम्मत आचरण की अनिवार्यता पर जोर दे रहा है जबकि देश संविधान से संचालित हो रहा है।
जातीय हिंसाओं की घटनाएं बढ़ती जा रही है, देश के प्रत्येक प्रदेशो में ऐसी भयानक, शर्मसार कर देने वाली घटनाएँ सामने है रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या का मामला अभी शांत नही हुआ था तब तक गुजरात के ऊना शहर से दिल दहला देने वाली घटना पूरी दुनियाँ की नजर में आई।
अभी सप्ताह भर पहले उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में दो अनुसूचित जाति के युवको को पेट्रोल डाल कर जिन्दा जलाया गया।
यह घटनाएँ सामान्य से सामान्य व्यक्ति को क्रोधित-विचलित कर सकती है। देश के प्रत्येक जवाबदार, जागरूक नागरिक का मौलिक अधिकार है की वह मौलिक अधिकारो के तहत इसकी कटु निंदा करे, विरोध करे और वर्तमान में भारत का युवा इसी जागृति के कारण सड़को पर आंदोलित है वह इन अमानवीय घटनाओ का पुरजोर विरोध कर रहा है।
सोशल साइट्स पर भी जातिवादी आतंकवाद पर टिप्पणी कर रहा है वह इन सभी घटनाओं के पीछे धार्मिक अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, जातिवादी मानसिकता को जवाबदार मान रहा है इसलिए वह तथ्यात्मक, संवैधानिक दायरे में रह कर विरोध करता है जबकि यह प्रत्येक भारतीय को करना चाहिए।
लेकिन अफ़सोस सक्षम वर्ग सत्य की आवाज को दबाना चाह रहा है इसके लिए वे धार्मिक भावनाओ की आड़ ले कर झूठे मुकदमे बनवा देते है।
पुलिस भी एक पक्षीय कार्यवाही कर रही है वे दूसरे पक्ष की दलील सुने बगैर क़ानूनी कार्यवाही कर निर्दोष अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़ा वर्गो, अल्पसंख्यकों को भयभीत करने का कार्य करती है।
अभी ज्वलन्त उदाहरण डॉ.शशी अतुलकर छिंदवाड़ा (म.प्र) का है इनके खिलाफ कथित उच्च जाति के लोगो ने पुलिस को ज्ञापन सौपा और मुकदमा कायम हो गया बिना आरोपी को तलब किए बिना?
जबकि महिला डॉ. शशी अतुलकर को जाति सूचक गालियाँ दी जाती है इस पर कोई ध्यान न दिया जाना घोर निंदनीय है।
सोशल मिडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी से पुलिस तुरन्त गिरफ्तार नही कर सकती - सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कमेंट करने के मामले में लगाई जाने वाली IT एक्ट की धारा 66 A को मार्च 2015 को रद्द कर कर चुकी है। न्यायलय ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)ए के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करार दिया था।
इस फैसले के बाद फेसबुक, ट्विटर सहित सोशल मीडिया पर की जाने वाली किसी भी कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए पुलिस आरोपी को तुरंत गिरफ्तार नहीं कर सकती है। न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण फैसला सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े इस विवादास्पद कानून के दुरुपयोग की शिकायतों को लेकर इसके खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया था।
वर्तमान में निम्नलिखित क़ानूनी धाराओ का गलत उपयोग किया जा रहा है.
1. धार्मिक भावनाएं भड़काने वाली पोस्ट या कमेंट (आईपीसी की धारा 295ए)
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली पोस्ट या कमेंट करता है तो उसके खिलफ आईपीसी की धारा 295ए के तहत मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। इस धारा के तहत दोषी पाए जाने पर अपराधी को 3 साल तक की जेल हो सकती है।
2. सांप्रदायिकता बढ़ाने वाली पोस्ट या कमेंट (आईपीसी की धारा 153ए)
यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष समूह, जाति, वर्ण या संप्रदाय के आधार पर द्वेषता फैलाने वाली पोस्ट या कमेंट सोशल साइट्स पर पोस्ट करता है तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए के तहत मुकदमा हो सकता है। इस धारा के तहत मुकदमा दर्ज होने पर 3 साल की सजा हो सकती है।
3. किसी के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली पोस्ट या कमेंट (आईपीसी की धारा 499 और 500)
यदि कोई व्यक्ति अपनी पोस्ट या कमेंट में किसी व्यक्ति विशेष के विरूद्ध उसकी मानहानि से संबंधित बातें लिखता है या कमेंट करता है अथवा गालियां देता है तो यह मान-हानि का मामला है। ऎसी पोस्ट या कमेंट करने पर आईपीसी की धारा 499 और 500 के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है। इसके तहत 2 साल तक की जेल हो सकती है
इतिहास गवाह है की सत्ता के दुरपयोग से देश के जागरूक, ईमानदार नागरिकों की आवाज दबाई जाती रही है बीजेपी सरकार अम्बेडकरवादियो, अल्पसंख्यकों की आवाज दबा रही है इससे स्पष्ट होता है की वह घोर साम्प्रदायिक, जातिवादी विचारधारा की समर्थक है।
किन्तु आज युवा आंदोलित है उसे सत्ताधारियो के बर्बर बर्ताव की कोई परवाह नही है अब वह निर्णायक परिणाम को लक्ष्य मान कर संघर्ष पथ पर अग्रसर है देखना है जीत किसकी होती है?
इस शोषण, अन्याय, षड्यंत्र एंव संवैधानिक अधिकारो के हनन के विरोध में अब देश का शोषित वर्ग अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़ा वर्ग मौन नही रहेगा युवा सड़को पर उतर कर आंदोलन करने हेतु बाध्य है।
लेख:
सुरेश पासवान, राष्ट्रीय महासचिव
वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी, भारत
आपको यह जानकर बेहद ख़ुशी होगी की भारत से विदेशों में नौकरी, व्यवसाय करने गए आप्रवासी भारतीय भी विश्वविभूति भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के समाजिक क्रांति के मिशन से जुड़ कर रचनात्मक योगदान देंगे यह सम्भव हुआ है सुचना क्रांति वेब दुनियाँ या इंटरनेट के कारण.
राजेश राज,प्रदेश अध्यक्ष-तेलंगाना
संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता माला दास ने संगठन का विस्तार करते हुए तेलंगाना प्रदेश अध्यक्ष
राजेश राज (Myakala.Rajesh.
S/O Raj Narsaiah) को नियुक्त किया है यह वर्तमान में सऊदी अरब में रहते है इनका परिवार हैदराबाद में निवासरत् है.
इन्होने बताया की इन्हें अम्बेडकरवाद क्या है इसकी जानकारी सोशल मीडिया से ही प्राप्त हुई वी लव बाबासाहेब पेज में प्रसारित पोस्ट, विडियो पढ़, देख कर हमारे महापुरुषों के संघर्षो से परिचित हुआ मन में एक ही कसक की बाबासाहेब अम्बेडकर ने हम सभी करोड़ो भारतीयो के लिए अपना सर्वश त्याग दिया ताकि हमे मनुष्यता का अधिकार मिले लेकिन हमने क्या किया? आज तक उन देवी, देवताओं, पण्डे पुजारियों के आगे नाक रगड़ी जिनसे हमे सिवाए अपमान के कुछ भी हासिल नही हुआ लेकिन अब शेष जीवन बाबासाहेब अम्बेडकर के प्रबुद्ध भारत अभियान में गुजरेगा मैं तेलंगाना राज्य में निवासरत् दोस्तों की सहायता से घर-घर अम्बेडकरवाद फैलाउंगा।
राजेश राज के प्रदेश अध्यक्ष की जवाबदारी पर समस्त पदाधिकारियो ने ख़ुशी जाहिर की है जिसमे प्रमुख है;
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
विवेक भारती, अविनाश गाडवे
राष्ट्रीय महासचिव
सुरेश पासवान
राष्ट्रीय सचिव
पंकज छायवान, दीपक नागले, प्रमोद शिंदे, गजेन्द्र जाटव, भीमजी मुछड़िया, आर. सी मनचन्दा
राष्ट्रीय प्रवक्ता- शौर्य गौतम आईटी सलाहकार- दीपक कुमार
राष्ट्रीय सयुक्त सचिव
1. राहुल प्रताप
प्रदेश अध्यक्ष
1. राकेश महाले(म.प्र)
2. हितेश सोलंकी(गुजरात)
3. नंदकुमार सोनवानी
4. गिरिराज वेद(राजस्थान)
5. भीमप्रकाश गौतम(उ.प्र)
6. सुनील चन्द्र नाथ(झारखण्ड)
7. उत्तकर्ष जामभुल्कर(विधर्भ, महाराष्ट्र)
एंव सभी सम्मानित प्रदेश के पदाधिकारीयो ने भी बधाई प्रेषित की है।
जैसा की आप जानते है कि "वी लव बाबासाहेब सोशल सोसाइटी(रजिस्टर्ड)" भारत का पहला सोशल मीडिया का समाजिक संगठन है जो फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, व्हाट्सऐप आदि नेटवर्किंग साईट्स के माध्यम से देश में अम्बेडकरवाद की विचारधारा प्रभावी रूप से प्रचारित कर रहा है अब धरातल पर भी इस संगठन की सक्रियता चर्चे का विषय बना हुआ है यह युवाओ में ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है.
फेसबुक में लगभग 54000 से ज्यादा फोल्लोवेर्स है और लाखो लोग इस संगठन के पेज की पोस्ट पढ़ते है.
व्हाट्सअप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का ग्रुप सक्रिय है, वी लव बाबासाहेब नामक ट्विटर हैंडल भी है इसके अतिरिक्त यूट्यूब, ब्लॉग के माध्यम से भी हमारे महापुरुषों की विचारधारा का जबरजस्त, प्रभावी प्रचार किया जा रहा है यही कारण है की देश के युवक-युवतियाँ इस संगठन से प्रभावित हो कर जुड़ रहे है.
सोशल मीडिया का चर्चित, लोकप्रिय संगठन वी लव बाबासाहेब सोशल सोसायटी में महाराष्ट्र से दो महत्वपूर्ण नियुक्तियाँ हुई है।
इंजीनियर उत्तकर्ष जामभुल्कर- अध्यक्ष ,विधर्भ क्षेत्र(महाराष्ट्र)
अधिवक्ता माला दास, राष्ट्रीय अध्यक्ष ने नागपुर के जुझारू, कर्मठ अम्बेडकरवादी इंजीनियर उत्तकर्ष जामभुल्कर को विधर्भ क्षेत्र(महाराष्ट्र) का अध्यक्ष एंव अकोला के सक्रिय समाजिक कार्यकर्ता जीवन घेयरे को जिलाध्यक्ष, अकोला, महाराष्ट्र नियुक्त किया है।
माला दास ने बधाई देते हुए दोनों पदाधिकारियों को निर्देश जारी किया है की वे शीघ्र अपनी कार्यकारणी बना ले और सक्रियता से बाबासाहेब अम्बेडकर के समाजिक मिशन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे।
उन्होंने यह भी कहा कि शीघ्र ही प्रदेश अध्यक्ष, महाराष्ट्र की नियुक्ति कर दी जायेगी।
गौरतलब हो की संगठन का द्वितीय राष्ट्रीय अधिवेशन की जोरदार तैयारी की जा रही है आशा है की भारत के सभी राज्यो के पदाधिकारी एंव सोशल मिडिया के चर्चित सक्रिय अम्बेडकरवादी बड़ी संख्या में हिस्सा लेंगे।
जैसा की आप जानते है कि "वी लव बाबासाहेब" भारत का पहला सोशल मीडिया का समाजिक संगठन है जो फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, व्हाट्सऐप आदि नेटवर्किंग साईट्स के माध्यम से देश में अम्बेडकरवाद की विचारधारा प्रभावी रूप से प्रचारित कर रहा है अब धरातल पर भी सक्रियता चर्चे का विषय है।
फेसबुक में लगभग 54000 से ज्यादा फोल्लोवेर्स है और लाखो लोग इस संगठन के पेज की पोस्ट पढ़ते है।
जीवन घेयरे जिलाध्यक्ष, अकोला, महाराष्ट्र
व्हाट्सअप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का ग्रुप सक्रिय है, ट्विटर में अम्बेडकरवादी विचारधारा से सम्बंधित उंगलियो में गिनने लायक ट्विटर हैंडल है जिसमे वी लव बाबासाहेब नामक ट्विटर हैंडल प्रमुख है इसके अतिरिक्त यूट्यूब, ब्लॉग के माध्यम से भी हमारे महापुरुषों की विचारधारा का जबरजस्त प्रचार किया जा रहा है यही कारण है की देश के युवक-युवतियाँ इस संगठन से प्रभावित हो रहे है।
अब देखना यह है की यह संगठन क्या धरातल पर भी लोकप्रिय होगा?
सुरेश पासवान, राष्ट्रीय महासचिव डब्लू एल बी एस ने बताया की संगठन के अधिवेशन के बाद हमारे कार्य में दोगुनी तेजी आयेगी।
आरक्षण विरोधियों,योग्यता-योग्यता का शोर मचाने वालो कभी इस मुद्दे पर भी कुछ बोला करो।
सिविल कोड की वकालत करने वाले,
भारत में समान शिक्षा प्रणाली पर चुप क्यों रहते है?
जैसा की हम जानते है भारत में जो शिक्षा नीति है वो बहुत ही दोषपूर्ण है या उसे जानबूझ कर व्यवसायिक बनाई गई है जिसमे अधिकारी के बच्चे अधिकारी, किसान मजदूर का बच्चा किसान मजदूर बनाने का षड्यंत्र किया जा सके। आज भारत में तीन तरह की शिक्षा प्रणाली हैं। आईसीइससीई बोर्ड, सीबीएससीई बोर्ड और स्टेट बोर्ड।
जबकि स्टेट बोर्ड के पढ़ने वाले बच्चे क्लर्क और चपरासी बन पाते हैं। ये संस्थाये 95% ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित है। 50% शासन द्वारा और 45% प्राइवेट स्कूलो के माध्यम से स्थापित हैं। इन संस्थाओ में पड़ने वाले बच्चे सिर्फ साक्षर होते है, पास होते है और किसी भी क्षेत्र में योग्य नही माने जाते है।
आज सरकारी विद्यालयो में ड्रेस, मिड डे मील, छात्रव्रत्ति, फीस किताबें सब दिया जा रहा पर शिक्षा नही दी जा रही है? गरीब किसान मजदूर का बच्चा इन स्कूलों में पढ़ कर अनपढ़ बन रहा है और मध्यमवर्गीय समाज अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के नाम पर कमाई का 40 % हिस्सा इसमें खर्च कर रहा है। फिर भी उनके बच्चे शिक्षित नही हो पा रहे हैं, शासन की गलत नीतियों के कारण आज शिक्षा माफिया मध्यमवर्गीय समाज को अज्ञान के कुँए में धकेल रहा है।
साथियो इन शासकीय पदों में रहने वाले लोगों को शासन की सभी सुविधाये चाहिए, वाहन, आवास, चिकित्सा, खाना, शासन की और से वेतन भत्ते और रिटायर मेंट के बाद पेंशन चाहिए, पर शासन द्वारा संचालित स्कूलो में इनके बच्चों को शिक्षा क्यों नही चाहिए?"
ऐसा प्रतीत होता है की शिक्षा माफियाओ ने राजनैतिक नेताओ से मिलकर षड्यंत्र रचा ग्रामीण गरीब माध्यमवर्गीय बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का और शिक्षा का निजीकरण के तहत सामान शिक्षा प्रणाली को नेस्तनाबूत कर डाला, और शिक्षको को विभिन्न कार्यो में उलझा दिया गया। उनका किस प्रकार से शोषण किया जा सके वो सब किया गया। जो उदाहरण के रूप में पैरा टीचर, शिक्षामित्र, शिक्षाकर्मी, संविदा शिक्षक, गुरूजी, अतिथि शिक्षकों के नाम से कई प्रजाति का निर्माण कर उनको दी जानी वाली सुख सुविधाओ वेतन भत्तो में कटौती कर दी है इस कारण आज भी ये वर्ग आंदोलित है।
आरक्षण विरोधी एंव राजनैतिक दल इस मुद्दे पर मौन रहते है क्योकि यह भेदभाव उन्हें पसन्द है?